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साहित्य एवं लेख

सिद्धपीठ की कथा

त्रेता युग की बात है, उस समय सती अनुसुया महर्षि अत्री चित्रकुट के निकट नदी किनारे आश्रम में रहते थे। दोनों ने जप–तप के बल पर सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया था। धीरे–धीरे दोनों के जप–तप की चर्चा देवताओं तक होने लगी।

सती अनुसुया और महर्षि अत्री को इसी तरह तपस्या करते हुए कई वर्ष व्यतीत हो गये तो एक दिन नारद जी, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा, विष्णु और महेश से बोले – हे प्रभु ! पृथ्वी पर कई वर्षो से सती अनुसुया व महष्रि अत्री आपकी तपस्या में लीन हैं। आपने उन्हें अभी तक आशीर्वाद नहीं दियां यह जानकर माता लक्ष्मी, सरस्वती व पार्वती आश्चर्य में पड़ गयीं और कहने लगी, ‘‘नारद जी विश्वास नहीं होता, हम रात–दिन ईश्वर की आराधना में ही नहीं रहती बल्कि प्रत्यक्ष हरदम उनके साथ भी रहती हैं तब कैसे सम्भव है कि पृथ्वी लोक में हमसे ज्यादा कोई ईश्वर की आराधना करता हो।’’ नारद मुनि यह वचन सुनकर बोले ‘‘आप विश्वास करें या न करें महर्षि अत्री इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।’’

महर्षि अत्री व सती अनुसुया की तपस्या के प्रति माता लक्ष्मी, सरस्वती व पार्वती को शंकालु देख त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) ने परीक्षा लेने का निर्णय लिया और तीनों ने साधु का वेश धारण कर अत्री ऋषि के चित्रकूट अरभ्म में अलचर जगाया।

साधुओं को आश्रम में आया देखकर सती अनुसुया प्रणाम कर बोली प्रभु आज्ञा दीजिए मैं आपकी क्या सेवा करूं ? साधु बोले देवी ! लम्बी यात्रा से आये हैं, बहुत भूख लगी है, यदि सेवा ही करना चाहती हो तो भोजन करा दो। सती अनुसुया बोली प्रभु आप विराजें, मैं अभी भोजन तैयार करती हूँ।

भोजन तैयार कर सती अनुसुया साधुओं को आसन ग्रहण करने का अनुरोध करने पहुंची तो साधु बोले देवी ! भोजन तो हम तब ही ग्रहण करेंगे, जब तुम निर्वस्त्र होकर भोजन परोसो। साधुओं के इस प्रकार के वचन सुन सती अनुसुया धर्मसंकट में पड़ गयी। एक ओर जहाँ पुरुषो के सामने निर्वस्त्र होना लज्जा की बात थी, वहीं दूसरी ओर भूखे को घर से बिना भोजन कराये लौटाना धर्मशास्त्रों के विरुद्ध था। अनुसुया ने काफी देर तक विचार करने के उपरान्त निर्णय लिया कि वह साधुओं को भोजन अवश्य करायेगी। सती ने अपने पति की आज्ञा से मन में यह निर्णय ले ईश्वर का ध्यान कर प्रार्थना की कि प्रभु अगर मैं अपने सत पर सही हूँ तो ये तीनों साधु शिशु का रूप धारण कर लें। ध्यान करने के बाद सती ने जैसे ही जल के छीटे साधुओं पर डाले तो तीनों साधु शिशु बन गये। सती ने तीनों को बारी–बारी गोद में उठाकर पालने में डाल दिया और निर्वस्त्र हो भोजन कराया। इसी प्रकार सती अनुसुया तीनों शिशुओं की सेवा करने लगी। इसी तरह दिन बीतने लगे। कई दिन बाद भी जब देव वापस देवलोक नहीं पहुँचे तो माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को चिन्ता होने लगी। उन्होने नारद मुनि को त्रिदेव का पता लगाने को कहा। नारद मुनि ने बताया कि त्रिदेव माता अनुसुया के आश्रम में हैं।

नारद से यह वचन सुनकर तीनों देवियों की चिन्ता बढ़ गई। तीनों ने सन्यासिनी का रूप धारण किया और वे माता अनसुया के आश्रम में पहुँच गई। वे अनुसुया से बोली, हम तीनों के पति आपके आश्रम में आये थे, वे कहाँ हैं ? त्रिदेव चूंकि शिशु के रूप में थे और तीनों का रूप एक ही था इसलिए यह पता नहीं चल रहा था कि कौन ब्रह्मा है, कौन विष्णु और कौन महेश है ? यह सब देखकर माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती असमंजस में पड़ गयीं और सती अनुसुया से शिशु बने तीनों साधुओं को उनके वास्तविक रूप में ले आने की प्रार्थना करने लगी।

माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती का अनुरोध सुन सती अनुसुया ने एक लोटे में जल लिया तथा अपने पति और भगवान का ध्यान कर तीनों शिशुओं पर छिड़क दिया तो तीनों शिशु साधुओं के रूप में प्रकट हो गये। माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती ने तीनों साधुओं से अपने असली रूप में आने की प्रार्थना की तीनों अपने असली रूप में प्रकट हो गये और माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती से बोले तुम भी अपने असली रूप् में आ जाओ  इस पर तीनों शक्तियों ने भी अपना वास्तविक रूप दिखा दिया।

त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु महेश) के असली रूप में आने पर सती अनुसुया व अत्री ऋषि लज्जित हो प्रभु के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे प्रभु ! क्षमा करें। हमसे अनजाने में भूल हो गयी आपको कई दिनों तक शिशु बनाये रखा। महर्षि अत्री व सती अनुसुया को लज्जित होता देखकर त्रिदेव बोले इस तरह लज्जित होने की आवश्यकता नहीं है। हम  सरस्वती, लक्ष्मी व पार्वती को यह बताना चाहते थे कि पृथ्वी लोक में भी एक से एक तपस्वी हैं, जिनके अधीन हम उनके वचनों को नहीं तोड़ सकते। त्रिदेव सती अनुसुया की परीक्षा से प्रसन्न हो बोले दीवी ! वरदान मांगो। त्रिदेव की बात सुन अनुसुया बोली प्रभु धन–पुत्र सब कुछ नाशवान है। हम तो इतने वर्षो से तपस्यारत् रह कर आपके दर्शन के अभिलाषी थे, आपने दर्शन दे कृतार्थ कर दिय अनुसुया की बात सुनकर त्रिदेव असमंजस में पड़ गये और कहने लगे ‘‘वरदान तो तुम्हें लेना ही होगा क्यों नहीं तुम पुत्र का ही वरदान मांग लो।’’

त्रिदेव के बार–बार वरदान मांगने के आग्रह को अनुसुया टाल न सकी और बोली प्रभु ! आप वरदान देना ही चाहते हैं तो, यदि आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए अन्यथा नहीं। त्रिदेव अनुसुया के इस वचन को सुनकर असमंजस में पड़ गये और कहने लगे देवी ! हम तीनों तुम्हारी कोख से जन्म लेते हैं तो आने वाले युगों (द्वापर, सतयु व कलयुग) को कौन चलायेगा ?

काफी सोच–विचार के बाद त्रिदेव अनुसुया से बोले देवी ! हम तुम्हारी कोख से जन्म अवश्य लेंगे मगर हमारे तीनों रूप न होकर एक ही बालक का रूप होगा। इस बालक के तीन शीश तथा चार भुजायें होंगी तथा बालक में तीनों की शक्तियां समाहित होंगी। इस तरह दत्तात्रेय के रूप में त्रिदेव ने सती अनुसुया के गर्भ से जन्म लिया। भगवान दत्तात्रेय योगियों के गुरु कहे जाते हैं। भगवान दत्तात्रेय का असाधारण कार्य है जिसका श्री विष्णु पुराण, वायु पुराण, ब्रह्मा, वैवर्त पुराण, मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण, ब्राण्ड पुराण, अग्नि पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद् भगवत् पुराण आदि में विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। भगवान दत्तात्रेय ने योगियों–साधकों के हृदय में ज्ञान का प्रकाश फैलाया। गुजरात के काठियाबाड़ में उनका सिद्धपीठ है, जहाँ उनके चरण पादुकाओं की पूजा की जाती है। श्री भगवत् पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध में सातवें अध्याय में तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेय ने अपने चौबीस गुरु बताये हैं।

भगवान दत्तात्रेय ने लोक कल्याण के लिए अपने चौरासी शिष्य बनाये तथा उन्हें सम्पूर्ण शक्तियां प्रदान की। ये चौरासी शिष्य वर्तमान में चौरासी सिद्धों के नाम से जाने जाते हैं।

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