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साहित्य एवं लेख

श्री सिद्धबली धाम महिमा

गुणत्रयविभेदेन मूत्र्तित्रयमुपेयुषे।
त्रयीभुवे त्रिनेत्रायं त्रिलोकीपतये नम:।।

रजोगुण की प्रधानता के कारण ब्रस्वरुप, सत्त्वगुण की प्रधानता के कारण विष्णु रुप तथा तमोगुण की प्रधानता के कारण शिवस्वरुप, इस भाँति से तीन मूर्तियों के धारण करने वाले तीनों लोकों के उत्पादक, तीनों वेदों के प्रकाशक तथा तीनों लोकों के स्वामी शिवजी को मेरा प्रणाम है।

इस पृथ्वी पर देवों के देव महादेव अर्थात् शिव जी कण–कण में विराजमान हैं। परन्तु उनका निवास स्थान हिमालय को माना गया है एवं इनकी पहाडि़यों को शिव नाम अर्थात शिवालिक श्रेणी के नाम से ही जाना जाता है। क्योंकि ये श्रेणियां अपने आप में साक्षात् शिवजी हैं। शिवजी अर्थात् शिखर, वन एवं जीव जिनकी सामंजस्यता ही शिव जी नाम को परिपूर्ण करती हैं अर्थात् जहाँ शिखर हों और उनमें वन हों तथा उनमें जीव हों तो शिवजी पर्वत श्रेणियों के रूप में साक्षात विराजमान होते हैं। पृथ्वी पर ऐसा स्थान हिमालय का केदारखण्ड (उत्तराखण्ड) ही है। जो देवस्थान ऋषि, मुनियों की तपस्थली के कारण सदैव ही पूज्यनीय है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि –

अथान्यद्वद महात्म्यं क्षेमाणां हिमपर्वते।
तस्मात् वामप्रदेशे हि गु परमगह्ववरा:।।
त्रिंशघोजन विस्तीर्णा नानामुनिगणाविन्वता:।।
जाबालिगलिवाश्चैव मार्कण्डेयो महामना:।।
च्यवनश्च महाभाग: भृगुपुत्रा अंगिरा मनु:।
एते चान्योनयवहवो मुनय: तप्तुमन्विता श्री:।।

जावालि, गालव, मार्कण्डेय, महामना च्यवन, तेजस्वी भृगु आदि महार्षियों की तपोसिद्धि का क्षेत्र, यही केदारखण्ड (गढ़वाल हिमालय) ही रहा है। इस प्रकार इस स्थान का कण–कण पवित्र एवं पुण्य है स्कन्द पुराण के अध्याय 57 (श्लोक 10) के अनुसार –

कण्वाश्रमं समारभ्य यावन्दगिरिभेवेत्।
तावत्क्षेत्रं परं पुण्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्।।
कण्वो नाम महातेजा महर्षिर्लोकविश्रुत:।
तस्याश्रमपदे नत्वा भगवन्तं रमापतिम्।।

अर्थात् कण्वाश्रम से लेकर नन्दगिरि तक जितना क्षेत्र है वह परम पवित्र एवं भुक्ति मुक्तिदायक है। लोक में विख्यात कण्वानामक महातेजस्वी महर्षि ने उस आश्रम में भगवान रमापति विष्णु को नमस्कार करके इस क्षेत्र में निवास करने के लिए प्रार्थना की जो प्रार्थना स्वीकृत हुई।

महर्षि कण्व का आश्रम मालिनी नदी के तट पर कोटद्वार क्षेत्र तक फैला हुआ था। इस कोटद्वार कस्बे के समीप चारों तरफ से द्वारपाल की तरह घिरी पर्वत श्रेणियों में पवित्र धाम श्री सिद्धबली मन्दिर स्थित है। जिसके चरणों में खोह नदी बहती है। कुछ विद्वानों ने स्कन्द पुराण के केदारखण्ड में वर्णित अध्याय 115 (श्लोक 25) में वर्णित –

गंगाद्वारोत्तरेभागे गंगाया: पाग्विभागके।
नदी कौमुद्वती ख्याता सर्वदारिद्रनाशिनी।।

अर्थात् गंगाद्वार (हरिद्वार) के उत्तर पूर्व यानि ईशान कोण के कौमुद तीर्थ के किनारे से कौमुदी नाम की प्रसिद्ध दरिद्रता हरने वाली नदी निकलती है। जिस प्रकार गंगाद्वार माया क्षेत्र व वर्तमान में हरिद्वार एवं कुब्जाम्र ऋषिकेष के नाम से प्रचलित हुए, उसी प्रकार कौमुदी वर्तमान में खोह नदी नाम से जानी जाने लगी। जो कौमुदी का अपभ्रंश है। जो डांडामण्डी क्षेत्र एवं हेमवन्ती (हयूल) नदी के दक्षिण से निकली है इस पौराणिक नदी के तट पर श्री सिद्धबली धाम पौराणिक सिद्धपीठ के रूप में विराजमान है। इस पवित्र धाम में जो साक्षात शिव द्वारा धारण, जिस पर शिवजी ने स्वयं निवास किया है। अपने आप में पूज्यनीय है।

श्री सिद्धबली धाम की महत्ता एवं पौराणिकता के विषय में कई जनश्रुतियां एवं किंवदन्तियां प्रचलित हैं। कहा जाता है। स्कन्द पुराण में वर्णित जो कौमुद तीर्थ है उसके स्पष्ट लक्षण एवं दिशायें इस स्थान को कौमुद तीर्थ होने का गौरव देते हैं स्कन्द पुराण के अध्याय 119 (श्लोक 6) में कौमुद तीर्थ के चिन्ह के बारे में बताया गया है कि

तस्य चिन्हं प्रवक्ष्यामि यथा तज्ज्ञायते परम्।
कुमुदस्य तथा गन्धो लक्ष्यते मध्यरात्रके।।

अर्थात महारात्रि में कुमुद (बबूल) के पुष्प की गन्थ लक्षित होती है। प्रमाण के लिए आज भी इस स्थान के चारों ओर बबूल के वृक्ष विद्यमान है। कुमुद तीर्थ के विषय में कहा गया है कि पूर्वकाल में इस तीर्थ में कौमुद (कार्तिक) की पूर्णिमा को चन्द्रमा ने भगवान शंकर को तपकर प्रसन्न किया था। इसलिए इस स्थान का नाम कौमुद पड़ा। शायद कोटद्वार कस्बे को तीर्थ कौमुद द्वार होने के कारण ही कोटद्वार नाम पड़ा। क्योंकि प्रचलन के रूप में स्थानीय लोग इस कौमुद द्वार को संक्षिप्त रूप में कौद्वार कहने लगे, जिसे अंग्रेजों के शासन काल मे अंग्रेजों के सही उच्चारण न कर पाने के कारण उनके द्वारा कौड्वार कहा जाने लगा। जिससे उन्होंने सरकारी अभिलेखों में कोड्वार ही दर्ज किया और इस तरह इसका अपभंरश रूप कोटद्वार नाम प्रसिद्ध हुआ। परन्तु वर्तमान में इस स्थान को सिद्धबाबा के नाम से ही पूजा जाता है। कहते हैं कि सिद्धबाबा ने इस स्थान पर कई वर्ष तक तप किया। श्री सिद्धबाबा को लोक मान्यता के अनुसार साक्षात गोरखनाथ माना जाता है जो कि कलियुग में शिव के अवतार माने जाते हैं। गुरु गोरखनाथ भी बजरंगबली की तरह एक यति है। जो अजर और अमर हैं। इस स्थान को गुरु गोरखनाथ के सिद्धि प्राप्त होने के कारण सिद्ध स्थान माना गया है एवं गोरखनाथ जी को इसीलिए सिद्धबाबा भी कहा गया है। नाथ सम्प्रदाय एवं गोरख पुराण के अनुसार नाथ सम्प्रदाय के गुरु एवं गोरखनाथ जी के गुरु मछेन्द्र नाथ जी पवन पुत्र बजरंगबली के आज्ञानुसार त्रियाराज्य में (जिसे चीन के समीप माना जाता है) जिसकी शासक रानी मैनाकनी थी, के साथ ग्रहस्थ आश्रम का सुख भोग रहे थे। परन्तु उनके परम तेजस्वी शिष्य गोरखनाथ जी को जब यह ज्ञात होता है तो उन्हें बड़ा दु:ख एवं क्षोभ हुआ तो वह प्रण करते हैं कि उन्हें किसी भी प्रकार उस राज्य से मुक्त किया जाय। जब वे अपने गुरु को मुक्त करने हेतु त्रियाराज्य की ओर प्रस्थान करते हैं तो पवन पुत्र बजरंग बली अपना रूप बदलकर इस स्थान पर उनका मार्ग रोकते हैं। तब दोनों यतियों के मध्य भयंकर युद्ध होता है। पवन पुत्र को बड़ा आश्चर्य होता है, कि वे एक साधारण साधु को परास्त नहीं कर पा रहे है। उन्हे पूर्ण विश्वास हो जाता है कि यह दिव्य पुरुष भी मेरी तरह ही कोई यति है। तब हनुमान जी अपने वास्तविक रूप में आते हैं और गुरु गोरखनाथ जी से कहते हैं कि मैं तुम्हारे तप बल से अति प्रसन्न हूँ। जिस कारण तुम कोई भी वरदान मांग सकते हो, तब श्री गुरु गोरखनाथ जी कहते हैं कि तुम्हें मेरे इस स्थान में प्रहरी की तरह रहना होगा एवं मेरे भक्तों का कल्याण करना होगा। विश्वास है कि आज भी यहाँ वचनबद्ध होकर बजरंग बली जी साक्षात उपस्थित रहते हैं तबसे ही इस स्थान पर बजरंग बली की पूजा की विशेष महत्ता है और इन्हीं दो यतियों (श्री बजरंग बली जी एवं गुरु गोरखनाथ जी) जो सिद्धबली बाबा के नाम से पुकारते हैं। यहाँ पर श्री गुरु गोरखनाथ जी ने अपना स्थायी स्थान बनाकर अपने शिष्य पवन नाथ को नियुक्त किया।

इस स्थान पर सिखों के गुरु संत गुरुनानक जी ने भी कुछ दिन विश्राम किया। ऐसा कहा जाता है कि इस स्थान को सभी धर्मावलम्बी समान रूप से पूजते एवं मानते हैं।

इस स्थान का जीर्णोद्वार एक अंग्रेज अधिकारी के सहयोग से हुआ। कहते हैं कि इस स्थान के समीप एक अंग्रेज अधिकारी (जो खमा सुपरिटेंडेंट हुआ करता था।) ने एक बंगला बनवाया जो आज भी इस स्थान पर मौजूद है। जब घोड़े पर चढ़कर इस बंगले पर रहने के लिए आया तो घोड़ा आगे नहीं बढ़ा तब उसने घोड़े पर चाबुक मारा तो घोड़े के अधिकारी को जमीन पर पटक दिया। तो वह बेहोश हो गया। उस अधिकारी को बेहोशी में सिद्धबाबा ने दर्शन देकर कहा कि इस स्थान पर मेरे द्वारा पूजे जाने वाली पिण्डियाँ जो खुले स्थान पर हैं। उनके लिए स्थान बनाओ तभी तुम इस बंगले में रह सकते हो, तभी उस अधिकारी द्वारा जन सहयोग से इस स्थान का जीर्णोद्धार किया गया। जो आज धीरे–धीरे भक्तों एवं श्रद्धालुओं के सहयोग से भव्य रूप धारण कर चुका है।

संकलनकर्ता : संजीव शर्मा

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