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साहित्य एवं लेख

श्रीहनुमत साहित्य की आवश्यकता

– ब्रह्मऋता

युग धर्म के प्रभाव से व्यक्ति का अछूता रह जाना असम्भव है। तम प्रधान कलियुग का भी अपना एक विशिष्ट धर्म है जिसका कथन हमारे पूर्व के ऋषियों ने प्राचीन इतिहास, पुराणादि ग्रन्थों में किया है। भगवान् वेदव्यास कलिधर्म का वर्णन करते हुए श्रीमदभागवत के बारहवें स्कन्ध में कहते हैं –

ततचानुदिनं धर्म: सत्य शौचं क्षमा दया।
कालने बलिना राजन् नङ्क्षयतयुर्बलं स्मृति:।।
वित्तमेव कलौ नृणां जन्माचारगुणोंदय:।
धर्मन्यायव्यवस्थायां कारणं बलमेव हि।।
(12/2/1-2)

समय बड़ा बलवान है, ज्यों–ज्यों घोर कलियुग आता जाएगा त्यों–त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मृति का लोप होता जाएगा। कलियुग में जिसके पास धन होगा, उसी को लोग कुलीन, सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे। जिसके हाथ में शक्ति होगी, वही धर्म और न्याय की व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा। त्रिकालज्ञ भगवान वेदव्यास की उपरोक्त बात वर्तमान समय में अक्षरश: सत्य सिद्ध हो रही हैं। वर्तमान का मानव समाज अपने नैतिक मूल्यों की दिनोंदिन हत्या करता जा रहा है, मानवता विलुप्त होती जा रही है, स्मरण शक्ति तो इतनी क्षीण होती जा रही है कि दर्शन और इतिहास की बात तो दूर रही, एक दिन पूर्व क्या किया और क्या कहा था, प्राय: लोगों को यह भी याद नहीं रहता। सदाचार समाप्त होता जा रहा है, उसका स्थान केवल अधिकार और धन की लोलुपता लेती जा रही है, ऐसी स्थिति में मनुष्य में शारीरिक तथा आत्मिक बल और विवेकशील बुद्धि की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती और यह सर्वमान्य सत्य है कि किसी भी व्यक्ति, जाति, समाज व राष्ट्र का विकास बल और बुद्धि के अभाव में होना कठिन ही नहीं बल्कि सर्वथा असम्भव है।

युग–धर्म एक प्राकृत नियम है जो प्राकृत तत्त्वों पर अपना अक्षुण्ण प्रभाव प्रकट करता है, किन्तु जो प्राकृत से संस्कृत हो जाते हैं, वे उस काल प्रभाव की सीमा से परे हो जाते हैं, इसको कई उदाहरणों के द्वारा प्रत्यक्ष किया जा सकता है। प्राकृत को यदि संस्कृत न बनाया जाए तो उसमें विकृति आनी स्वाभाविक है। जैसे दूध एक प्राकृतिक पदार्थ है, यदि उसको उबाल कर, दही जमा कर उससे मक्खन और उसके सार रूप में घी निकाल लिया जाए तो उसे अधिक काल तक सुरक्षित तथा माहानर् शक्ति वद्र्धक, बुद्धि–वद्र्धक और उपयोगी बनाया जा सकता है। किन्तु यदि उस दूध का संस्कार न किया जाए, तो उसे संशोधित, परिमार्जित कर उसका सार न निकाल लिया जाए तो वह विकृत हो कर विनष्ट हो जाएगा, इसमें संदेह नहीं। इसी प्रकार से मनुष्य जन्म से एक प्राकृतिक प्राणी है यदि उसे संस्कृत न किया जाए तो अन्य पदार्थो की तरह वह भी प्रकृति के प्रवाह में पड़े रहने से विकृत हो जाता है, मनुष्य  के रूप में हिंसक प्राणी से भी बदतर हो जाता है। इसलिए प्राकृत मनुष्य  को संस्कृत बनाना अत्यन्त ही आवश्यक है। संस्कृत बनाने के लिए ही परमात्मा ने मानव सृष्टि के साथ ही वैदिक विज्ञान को अवतरित किया है। जिस विधा से मनुष्य  प्राकृत से संस्कृत बनाया जाता है उस विधा का नाम ही धर्म है, ऐसा वैदिक साहित्य से ज्ञात होता है।

वैदिक साहित्य का ‘धर्म’ शब्द स्वयं में एक व्यापक अर्थ रखता है। उसे सम्प्रदाय, रिलिजन, मज़हब व पंथ का पर्यायवाची समझना उस शब्द के साथ घोर अनयाय है। जहाँ पर रिलिजन, मज़हब, पंथ व सम्प्रदाय, ईश्वर की आराधना एवं परलोक की प्राप्ति का मार्ग बताते हैं वहाँ पर ‘धर्म’ व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास के साथ नि:श्रेयस की प्राप्ति की पूर्ण विधि प्रदान करता है। ज्ञान विज्ञान युक्त शिक्षा, संस्कृति तथा अन्तर्विकास की परिपूर्ण साधना, ये सभी कुछ धर्म शब्द में समाहित हैं धर्म शब्द की व्याख्या करते हुए महर्षि कणाद ने कहा है –

यतअभ्युदयो नि:श्रेयस् सिद्धि स धर्म:।

जिस साधना के द्वारा मनुष्य  अपना शारीरिक, ऐन्द्रिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास करता हुआ पूर्णत्व को प्राप्त करता है, वही धर्म हैं धर्म मार्ग के प्रतिपादक चार प्रमुख अंग हैं – वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मरुचि। इस सम्बन्ध में महात्मा मनु का कथन है –

वेद: स्मृति: सदाचार स्वस्य च प्रियमात्मन:।
एतच्चतुर्विधं प्राह: साक्षाद्धर्मस्य लक्शणम।।

वेद प्रतिपादित सिद्धान्तों का ही ऋषियों द्वारा विस्तृत विवेचन स्मृति शास्त्रों के रूप में किया गया है इसलिए वेद और स्मृति, ये दोनों ही धर्म मार्ग के प्रतिपादक शास्त्र हैं किन्तु विद्वानों की राय है गाड़ी भर शास्त्रज्ञान की अपेक्षा रती भर सदाचरण विशेष मूल्यवान एवं उपयोगी होता है। इसलिए धर्म–अधर्म के निर्णय में सद्पुरुषों द्वारा किये गये सदाचरण का विशेष स्थान है।

इतिहास में अनेकों सद्पुरुषों के जीवन चरित्र का वर्णन प्राप्त होता है और सभी महापुरुष अपने आप में दैवी गुणों के समाश्रय प्रतीत होते हैं किन्तु सभी के द्वारा अपनाया गया सदाचरण एक सा नहीं मिलता। जिज्ञासा यह होती है कि किस  महापुरुष के सदाचरण को प्रमाण माना जाए ? इस जिज्ञासा के उत्तर में महात्मा मनु का कथन है – ‘स्वस्य च प्रियमात्मन:’। जिस  महापुरुष द्वारा अपनाया गया सदाचरण अपनी अन्तरात्मा को स्पर्ष करता हो, प्रिय लगता हो, श्रुति–स्मृति द्वारा प्रतिपादित, अनुमोदित हो, वही सदाचरण व्यक्ति के लिए आदर्श होता है। यह सर्वमान्य सत्य है कि मनुष्य जो कुछ भी जानता है, समझता है, सीखता है, करता है, उन सब का स्रोत उसके मार्ग दर्शक श्रेष्ठजन ही होते हैं गीता में भगवान् ने भी व्यक्ति, जाति, समाज व राष्ट्र के व्यक्तित्व तथा कतृ‍र्त्व में श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण को ही हेतु बताया है। उनका कथन है –

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं करुते लोकस्तदनुवर्तते।।

श्रेष्ठ पुरुष जिस–जिस प्रकार का आचरण करते हैं जनसामान्य भी उसी का अनुकरण करता है और वे जिस बात को प्रमाण रूप में प्रतिष्ठित कर देते हैं, मानव समाज उसी का अनुवर्तन करता है। इससे यह ज्ञात होता है कि जीवन में सर्वतोमुखी विकास तथा पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए महापुरुषों का आदर्श चरित्र ही श्रेष्ठतम अवलम्बन होता है। इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण प्राप्त होते हैं जिसमें अबुद्ध, अल्पज्ञ तथा शास्त्र ज्ञान शून्य व्यक्ति भी सद्पुरूषों के संसर्ग में आकर उनका अनुकरण करते हुए पूर्ण विकसित जीवन को प्राप्त कर लिया है।

वर्तमान की संकटकालीन वेला में युग धर्म के प्रभाव से मानव समाज प्रकृति से विकृति की दिशा में ही बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में यदि समुचित प्रयत्न न किया गया तो अधर्म की प्रचण्ड वृद्धि इसके सर्वनाश में कारण बनेगी। शास्त्र मे जिस प्रकार से धर्म के चार चरण बताये हैं –

सत्य दया तपो दानमिति पादा विभोनृ‍र्प। (श्रीमद्भागवत 12-3-18)

सत्य, दया, तप और दान रूप धर्म स्वयं भगवान् का ही स्वरूप है, ऐसा शास्त्र का कथन है। इसी प्रकार से अधर्म के भी चार चरण हैं। श्रीमद्भागवत में भगवान व्यासदेव ने उनका भी उल्लेख किया है –

अधर्मपादैरनृतहिंसासंतोश विग्रहै:।

अधर्म के चार चरण हैं – असत्य, हिंसा, असन्तोष और कलह। जब मानव समाज धर्म के अंगों से रहित हो जाता है तो उसमें अधर्म के इन चारों अंगों की स्वभावत: अभिवृद्धि होने लगती है और इनके द्वारा सम्पूर्ण मानव समाज विपत्ति और विनाश के गर्त में पहुंचा दिया जाता है। तत्त्ववेता मनीषियों का कथन है कि स्वार्थ बुद्धि ही अधर्म की जन्दातु और परार्थ बुद्धि धर्म की जननी है। अविद्या और अज्ञान स्वार्थ भाव के माता–पिता हैं तथा विद्या और विज्ञान परार्थ भाव के मानव समाज में स्वार्थ भावना की जन्मदातृ अविद्या की दिनों दिन वृद्धि होती जा रही है। जिसके दु:खद परिणाम से पार पाना सम्भव नहीं। ऐसी स्थिति में लोकहित चिन्तकों के लिए यह परमावश्यक है कि मानव समाज के हित में किसी एक ऐसे आश्रय की प्रतिष्ठा कर उसके प्रति जनमानस में सद्भावना एवं अभिरुचि को जागृत करें जिससे उसके जीवन में विद्या, विज्ञान की पुन: प्राप्ति हो सके।

काल धर्म से विकृति को प्राप्त हुआ मानव समाज सुसंस्कृत तभी हो सकता है जबकि उसमें विद्या और विज्ञान के प्रति अनुराग एवं अभिरुचि जागृत हो। विद्या विज्ञानयुक्त व्यक्ति, जाति, समाज व राष्ट्र शक्ति और समृद्धि का पात्र बनता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मानव समाज को एक ऐसे आश्रय, आदर्श और आराध्य की आवश्यकता है जो विद्या, विज्ञान और शक्ति से युक्त मानव देवत्व को नहीं दानवत्व को प्राप्त हो गया है क्योंकि उसमें इन विशिष्ट गुणों के प्रभाव से अहं की अभिवृद्धि एक ऐसी सीमा तक पहुंच गई कि वह अपने जीवन के स्रोत सर्वेश्वर को ही भूलकर मोहवश स्वयं को ही ईश्वर मान बैठा। इसलिए विद्या, विज्ञान तथा शक्ति से सम्बन्धित होते हुए भी जो सर्वेश्वर की अनन्त भक्ति से युक्त नहीं, वह मानव समाज के लिए उचित आदर्श नहीं हो सकता। यथार्थत: मानव समाज के लिए वही श्रेष्ठ, अनुकरणीय, आराध्य आदर्श है जो विद्या, विज्ञान, शक्ति से युक्त सर्वेश्वर की भक्ति से आप्लावित हो। इतिहास का अवलोकन करने पर ऐसे परमादर्श के रूप में हमारे समक्ष केवल एक ही व्यक्तित्व दिखाई देता है जिसका अनुकरण कर मानव सुसंस्कृत हो स्वयं के जीवन को सार्थक एवं सर्वोपयोगी बना सकता है। वह परम पावन व्यक्तित्व है भगवान् श्री आंजनेय हनुमान का। उनका जीवन शक्ति, भक्ति, विद्या और विज्ञान का साकार विग्रह है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अल्प बुद्धि मान के प्रतिनिधि के रूप में प्रार्थना करते हुए लिखा है –

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन–कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोंहि हरहु कलेस बिकार।।

‘‘स्वयं को बुद्धि तथा बल से रहित जानकर पवन कुमार हनुमान का सुमिरन करता हूँ, वे करुणानिधान मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान कर अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेश, अभिनिवेश आदि क्लेशों से उत्पन्न हुए समस्त शोक संताप रूपी विकार का हरण करें।’’

महर्षि वाल्मीकि ने भी भगवान् मारुति को समस्त सद्गुणों का समाश्रय बताया है –

शौर्यं दाक्ष्यं बलं धैर्यं प्राज्ञता नयसाधनम्।
विक्रमश्च प्रभावश्च हनूमति कृतालया:।।
(वा0रा0 7-3 5-3)

‘‘शौर्य, दक्षता, बल, धैर्य, प्राज्ञता, नीति पूर्वक कार्य करने की क्षमता, प्राक्रम तथा प्रभाव, इन सभी सद्गुणों ने हनुमान जी को अपना आश्रय बना लिया है।’’ श्रीमारुत के यथार्थ स्वरूप का बोध कराते हुए ऋक्षराज जाम्बवान् कहते हैं –

बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्वं च हरिपुंगव।
विशिष्टं सर्वभूतेशु किमात्मानं न बुध्यसे।।
(वा0रा0 4-6 6-7)

‘‘वानर श्रेष्ठ ! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज तथा सत्व, पौरुष सृष्टि के समस्त प्राणियों से विशिष्ट है, फिर तुम अपने स्वरूप को क्यों नहीं पहचानते ?’’ गोस्वामी तुलसीदास जी ने सुन्दरकाण्ड के प्रारम्भ में ही एक श्लोक में उनकी शक्ति, ज्ञान, गुण, एवं अनन्य भक्ति का वर्णन किया है।

मानव की विपन्नता को देखते हुए उसके जीवन में विद्या–विज्ञान युक्त शक्ति और भक्ति का सृजन करने के लिए भगवान् आंजनेय से श्रेष्ठ अन्य कोई आराध्य आदर्श नहीं हो सकता। मनोविज्ञान का यह सिद्धान्त है कि जिसका हम चिन्तन करते हैं उसी के गुण, स्वभाव से हमारा जीवन अभिभूत हो जाता है और चिन्तन उसी का होता है जिस को हम अपने जीवन का आधार स्वीकार करते हैं। जीवन का आधार ही हमारा उपास्य होता है, आराध्य होता है इसीलिए तत्त्ववेता मनीशियों ने मानव के लिए देवोपासना की व्यवस्था की है। वर्तमान का मानव यदि आस्था युक्त हो श्रद्धा विश्वास के साथ श्री आंजनेय की उपासना, आराधना करता है, उनके दिव्य ग9#2369;णों;ा चिन्तन करते हुए उनके पावन चरित्र का अनुकरण करता है तो वह अवश्य ही उनके दिव्य गुणों से युक्त हो उनकी कृपा का पात्र बन जाएगा, इसमें किंचित सन्देह नहीं। प्राकृत मानव को विकृति से विमुक्त कर संस्कृत बनाने का यही एक सर्वोत्तम साधन है। ऐसा शाश्वत सिद्धान्त के प्रतिपादक महर्षियों ने घोशित किया है।

संकलनकर्ता : संजीव शर्मा

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