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साहित्य एवं लेख

पौराणिक तीर्थस्थल स्वयंभू शिवलिंग टपकेश्वर महादेव
श्री गुरू द्रोणाचार्य जी की तपस्थली द्रोण गुफा, देहरादून।


पौराणिक श्री टपकेश्वर महादेव मन्दिर, आदि अनादि तीर्थस्थल है। महाभारत युद्ध से पूर्व श्री गुरू द्रोणाचार्य जी अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए हिमालय में पहुंचे। उन्हें एक ऋषिराज मिले उन्होंने ऋषिराज को दण्डवत प्रणाम किया और अपना मनोरथ व्यक्त किया। मुनि बोले ‘‘वत्स द्रोण। निराश मत हो अब शीघ्र ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।’’ गुरू द्रोणाचार्य गद्गद् हो गये और प्रश्न किया, ‘‘हे, मुनिश्वर ! कृपापूर्वक मुझे बताइये कि भगवान शंकर के दर्शन कहाँ और कब होंगे ?’’ ऋषि बोले, ‘‘हे द्रोण आप ऋषिकेष की ओर प्रस्थान करें, गंगा और जमुना के मध्य मे पवित्र तमसा नदी बहती है। पूर्व काल में इस नदी को देवधारा के नाम से जाना जाता था। इसी नदी के किनारे दिव्य गुफा है जिस गुफा में आज तपेश्वर नामक स्वयंभू शिवलिंग विराजमान हैं पूर्वकाल में इसी दिव्य गुफा में देवता लोग शिव आराधना किया करते थे और भगवान शंकर देवेश्वर महादेव के रूप में उन्हें दर्शन दिया करते थे, और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती थी। हे द्रोण ! आप भी उसी स्थान पर जाकर भगवान शंकर की आराधना करो।

भगवान भोलेनाथ ! बहुत दयालु और कृपालु हैं वे भक्तों के सभी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण करते है। अत: तुम शीघ्र उस गुफा की ओर प्रस्थान करो। ऋषिकेष से गुरू द्रोण इस दिव्य गुफा में आ पहुँचे। कल–कल, छल–छल करके बहती हुई पवित्र देवधारा नदी का पावन तट जहाँ शेर और हिरन बैर भाव त्यागकर एक ही घाट में पानी पी रहे थे। यह देखकर गुरू द्रोण आश्चर्य चकित हो गये। आस–पास गुफाओं में देखते हैं अनेक तपस्वी कठोर तपस्यारत थे। गुफा में प्रवेश करते ही सुख अनुभूति गुरू द्रोण को हुई जिसका शब्दों में वर्णन सम्भव नहीं है। उन्होंने भगवान शिव को जल एवं श्वेत पुष्प अर्पित किये। गुरू द्रोण और माता कृपी तपस्या में लीन हो गये। बारह वर्ष की घोर तपस्या के पश्चात् भगवान शंकर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए और बोले, ‘‘वत्स द्रोण ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ वर मांगो।’’

कहा जाता है भगवान शंकर रोज़ प्रकट होते थे और एक अध्याय धनुर्विद्या के बारे में पढ़ाते और धीरे–धीरे गुरू द्रोण को सम्पूर्ण अस्त्र–शस्त्र का ज्ञान प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् द्रोण की पत्नी कृपी कुछ अप्रसन्न मुद्रा में रहने लगीं। एक दिन गुरू द्रोण बोले, ‘‘प्रिये ! कुछ समय से मैं देख रहा हूँ तुम कुछ चिन्तित सी हो, मुझे इसका कारण बताओ।’’ द्रोण पत्नी बोली, ‘‘हे स्वामी ! आज तक तो मैं आपके साथ वन–वन भटकती रही, मुझे यही चिन्ता सताये जा रही है कि स्त्री के जीवन में इच्छा होती है कि वह माँ बने और उसे सन्तान की प्राप्ति हो।’’ गुरू द्रोण बोले, ‘‘हे प्रिये भगवान शिव का चिन्तन करो वे अन्तर्यामी हैं अवश्य ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।’’ तत्पश्चात् सन्तान प्रप्ति हेतु पुन: द्रोण दम्पत्ति भगवान शिव की पूजा अर्चना करने लगे। कुछ समय बाद भगवान शिव की कृपा उन्हें प्राप्त हुई और भगवान ने उनका मनोरथ पूछा उन्होंने पुत्र प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। भगवान शंकर पुत्र प्राप्ति का वरदान देकर अन्तध्र्यान हो गये। कुछ समय व्यतीत होने के बाद माता कृपी के गर्भ से सुन्दर तेजस्वी और हृष्ट–पुष्ट बालक ने जन्म लिया। जन्म लेते ही उसकी आवाज अश्व की तरह थी और दूर–दूर तक उसकी आवाज गूँजी, देवताओं ने पुष्प वर्षा की। भगवान शिव की कृपा से मनोकामना पूर्ण होने के कारण दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। अश्व की तरह आवाज़ के कारण इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। बचपन से ही बालक अश्वत्थामा तेजस्वी, नटखट और बलशाली थे। धीरे–धीरे बड़े होने लगे। एक दिन अश्वत्थामा घूमते–घूमते घोर जंगल में पहुँच गये जहाँ कुछ अन्य ऋषि कुमारों से उनकी दोस्ती हो गयी।

अब तो रोज़ खेलने के लिए बालक अश्वत्थामा जाने लगे। एक दिन उनके सखा देर से खेलने आये। अश्वत्थामा ने देरी से आने का कारण पूछा, मित्र बोला ‘‘मेरी माता गोबर से कुटिया में लिपाई कर रही थी, माँ के दोनों हाथ गोबर से सने थे, मैं दूध पीना चाहता था, माँ ने काम निपटाने के बाद मुझे स्तनपान कराया और माँ का दूध पीकर मैं आ रहा हूँ।’’ चूँकि माता कृपी को उस दौरान दूध नहीं होता था और गुरू द्रोण के पास गाय भी नहीं थी इस कारण अश्वत्थामा को दूध नहीं मिल पाता था। एक दिन बालक अश्वत्थामा जब एक ऋषिकुमार के साथ उनकी कुटिया पर पहुँचे तो देखा, उनके मित्र की माँ गाय का दूध निकाल रही है। अपने सखा के घर प्रथम बार उन्होंने दुग्ध पान किया। अश्वत्थामा जब वापस गुफा में आते हैं, माँ कृपी बालक को चावल का माँड पीने को देती है, तो अश्वत्थामा पीने से इन्कार करते हैं, ‘‘मुझे अपना दूध पिलाओ’’, और कहते हैं कृपी मन ही मन परेषान हो जाती है। आज तक मेरे बच्चे ने कुछ माँगा नहीं, आज माँगा तो मेरे पास कुछ है नहीं। जब द्रोण को सारी जानकारी हुई, तो गुरु द्रोण गाय के लिए हस्तिनापुर (वर्तमान मेरठ) गये। भगवान की लीला से राजा दु्रपद ने उन्हें गाय देने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। गुरू द्रोण निराश होकर गुफा में पहुंचे, तब तक माता कृपी बच्चे को पिता के आने पर दूध देने के लिए धैर्य बंधायी हुई थी। द्रोण के आते ही आशा की किरण ही खत्म हो गयी। द्रोण ने कृपी को समझाया भगवान शंकर ही अब इसकी इच्छा को पूर्ण कर सकते हैं।

उन्होंने बालक को समझाया कि मैं गाय लेने गया था। किन्तु सारी की सारी गायें तो भगवान शंकर के पास हैं, अब तुम उन्हीं की आराधना पूजा से दूध प्राप्त कर सकते हो। अश्वत्थामा के मन में भक्ति की लौ जल गई और वह एक पाँव में खड़े होकर कठोर तपस्या करने लगे। भगवान आशुतोष शंकर उनकी परीक्षा हेतु सन्यासी के रूप में प्रकट होते हैं, उनका दिव्य तेज चारों ओर फैल जाता है और उसका मनोरथ पूछते हैं।

तब अश्वत्थामा दूध का मनोरथ बताते हैं। किन्तु सन्यासी अन्तध्र्यान हो जाते हैं। बालक निराश हो जाता है। माता पार्वती बालक की कठोर तपस्या से द्रवित हो जाती हैं, उधर बालक की आंखों से अश्रुधारा बहने लगती है। अनायास ही आंसुओं से शिवलिंग का अभिषेक हो गया और भगवान शंकर माता पार्वती सहित प्रकट हो जाते है। पूर्णमासी में गुफा से दुग्ध धारा प्रवाहित होने लगती है और शिवलिंग का अभिषेक करते हुए दूध नीचे गिरता है। शिवलिंग दूधेश्वर नाम से विख्यात हुआ और अश्वत्थामा की दूध की अभिलाशा पूर्ण हुई। अब बालक अश्वत्थामा कुमार अवस्था में आ गये थे और पिता से अस्त्र–षस्त्र का ज्ञान लेने लगे। गुफा से प्रस्थान से पूर्व गुरु द्रोण ने सपरिवार भगवान शिव की आराधना की, ‘‘हे देवेश्वर ! हे तपेश्वर ! हे दूधेश्वर जिस प्रकार आपने मुझ पर कृपा की उसी प्रकार की कृपा आप कलयुग में भी करना। मैं अज्ञानी था, आपने मुझे यश दिया, मैं नि:सन्तान था, मुझे आपने अश्वत्थामा सा वीर पुत्र दिया, बाल भक्ति के आगे आपने पहाड़ तक से दूध की धारा प्रवाहित कर दी।’’ भगवान शंकर बोले, ‘‘हे द्रोण ! कलयुग मे भक्तों को साक्षात दर्शन तो नहीं मिलेगा, किन्तु भक्तों की सभी मनोकामनायें, सच्चे मन से की गई पूजा–अर्चना, जलाभिषेक आदि से पूर्ण होगी।’’ दूध का क्रम कलयुग तक चलता रहा, कलयुग के प्रभाव से लोग दूध का गलत उपयोग करने लगे। माँ पार्वती ने भगवान शंकर को महासमाधि से जगाया और भगवान शंकर ने भक्तों के कल्याण के लिए दूध की जगह जल की धारा प्रवाहित की जो गंगा जी का ही स्वरूप है। दूध की जगह पवित्र जल गिरने के कारण यह शिवलिंग टपकेश्वर महादेव के नाम से प्रचलित हो गया। इसलिए गुफा के अन्दर गिरने वाले पवित्र जल को छूना मना है जिससे भगवान शंकर का अखण्ड अभिषेक खंडित न हो।

आज भारत से ही नहीं सम्पूर्ण विश्व से श्रद्धालु इस स्वयंभू लिंग के दर्शन के लिए आते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं। यह स्थान द्रोणाचार्य की तपस्थली के रूप में विख्यात है। टौंस नदी के तट पर स्थित इस प्राकृतिक स्वयंभू स्थान की छटा परम् शान्ति प्रदान करती है।

संकलनकर्ता : संजीव शर्मा

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