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 श्री रामसेतु

प्रभु श्रीराम ने विश्वकर्मा के ओरस पुत्रों नल व नील एवं अंगद, हनुमान और वानर सेना के द्वारा श्रीलंका जाने के लिए ‘‘रामसेतु’’ का निर्माण कराया था। इसी सेतु से होकर श्री रामचन्द्रजी अपनी सेना सहित श्रीलंका गए थे। हमारे सभी पौराणिक ग्रन्थों में रामसेतु निर्माण का बड़ा ही विस्तृत एवं रोमांचक वर्णन उपलब्ध है।

वाल्मीकि रामायण, महाभारत, स्कन्द पुराण, कूर्म पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण, नारद पुराण, अग्नि पुराण, ब्रह्म पुराण, पद् पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण और सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित रामायणों में श्री रामसेतु के निर्माण का विस्तृत वर्णन मिलता है।

रामसेतु, रामार ब्रिज, नल सेतु और हनुमान सेतु के अतिरिक्त एडमस ब्रिज, आदम पुल आदि नामों से भी रामसेतु जाना जाता है।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रथम सर्वेयर जनरल श्री जेम्स रेनल ने 1788 में हिन्दुस्तान का वह राजनीतिक नक्शा बनाया था जिसमें भारतीय समुद्री तट पर स्थित रामनकोईल और तलईमन्नार (श्रीलंका का तट) को जोड़ने वाले सेतु को ‘रामार सेतु’ अंकित किया गया है। परन्तु इन्हीं महाशय ने इसी नक्शे की एक औश्र प्रतिलिपि 1804 में तैयार की, जिसमें ‘रामार ब्रिज’ के स्थान पर ‘एडमस ब्रिज’ अंकित कर दिया। यह क्यों किया गया ? किसके कहने पर किया ? यह शोध का विषय है।यह ऐतिहासिक दस्तावेज तंजौर के सुप्रसिद्ध सरस्वती महल पुस्तकालय में मौजूद है।

श्री रामसेतु के रामायणकालीन अकाट्य पुरावशेष सेतुबन्ध रामेश्वरम् तीर्थ में आज भी स्थित हैं –

केदण्डराम मन्दिर –
विभीषण की प्रभु श्रीराम शरणागति इसी स्थान पर होने की मान्यता प्रचलित है। भगवान ने विभीषण का राजतिलक यहीं पर किया था। आज यहाँ विशाल मन्दिर विद्यमान है।

रामझरोखा मन्दिर –
रामेश्वरम् मन्दिर के उत्तर–पश्चिम में 3 कि.मी. दूर गन्धमादन पर्वत पर रामझरोखा मन्दिर स्थित है। ‘राम का युद्ध मंत्रणा शिविर’ इसी स्थल को कहा जाता है।

दर्भशयनम् –
इस विशाल मन्दिर में प्रभु रामचन्द्र जी की शयन मुद्रा मूर्ति है। समुद्र से रास्ता माँगने के लिए यहीं पर रामचन्द्र जी ने 3 दिन तक समुद्र से प्रार्थना की थी। यह रामायण काल की घटना का जीवन्त स्मारक है। (सेतु की चौड़ाई इस दर्भशयनम् से लेकर देवीपत्तनम् होते हुए छेदुकराई तक मानी जाती है।)

रामलिंगविलास शिला –
ऊँचे सिंहासन पर 30 से.मी. ऊँचा एक वर्गाकार चमकदार पत्थर रखा है, इसी को रामलिंग विलास शिला कहते हैं। सुन्दर पत्थर की चौकी, प्राचीनकाल का सिंहासन जिस पर श्रृग्वेरपुर (प्रयाग उ.प्र.) के निषाद गुह का प्रथम ‘सेतुपति’ के रूप में अभिषेक श्रीरामचन्द्र जी ने इसी स्थान पर किया था।

सबसे बड़ा स्मारक तो ‘सेतुबन्ध रामेश्वरम्’ है जो चारों धमों में से एक प्रमुख धाम है।

क्या यह सत्य नहीं है ?

  • भारत सरकार के भू–सर्वेक्षण विभाग के प्रतीक चिन्ह पर ‘आसेतु हिमाचलम्’ अंकित है।

  • नसा के जैमिनी नामक अन्तरिक्ष उपग्रह ने 1966 में पहली बार सेतु के चित्र लिए थे।

  • 1983 से लेकर 1944 तक नासा ने अपने अनेक अन्तरिक्ष अभियानों में सेतु की तस्वीरें खींची।

  • 1991 में नासा ने दिल्ली में आयोजित एक सेटेलाइट चित्र प्रदर्शनी में इन चित्रों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया था।

  • भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन ‘इसरो’ ने भी 26 अक्टूबर 2003 को श्रीराम सेतु से जुड़े चित्र जारी किये।

  • रामसेतु की ऐतिहासिकता और प्राचीनता को प्रमाणित करने वाले तथ्यों को श्रीलंका की इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में आज भी पढ़ाया जा रहा है।

रामसेतु की पूजा करने समुद्र में कौन जाता है ?

रामसेतु की पूजा करने समुद्र में कौन जाता है ? सुप्रीम कोर्ट के पूछे गये इस सवाल का जवाब पूर्व केन्द्रीय मन्त्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रण्यम स्वामी द्वारा दिया गया। जवाब में उन्होंने यह कहा कि हम सूर्य की पूजा करते हैं तो क्या सूर्य पर जाते हैं ?

स्वामी के इस जवाब से मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बैंच चकित रह गयी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि किस तरह से रामसेतु की खुदाई कर रही हॉलैण्ड की डे्रजिंग मशीन बार–बार खराब हुई। उन्होंने कहा कि यह मामला पूरे विश्व में एक अरब हिन्दुओं की आस्था का है। उन्होंने बताया कि जब डे्रजिंग मशीन के टूटे हिस्सों को निकालने के लिये क्रेन का इस्तेमाल किया गया तो क्रेन भी टूट गयी। अन्तत: अधिकारियों ने ऐसी क्रेन लगायी, जिस पर ‘हनुमान्’ लिखा था, लेकिन तब भी डे्रजिंग मशीन के टूटे हुए हिस्से नहीं निकाले जा सके। इसके बाद रूसी डे्रजिंग विशेषज्ञ को बुलाया गया, लेकिन इस आपरेशन में वे अपनी टाँगे तुड़वा बैठे। स्वामी के इन तर्कों को बेंच मुस्करते हुए सुनती रही। उन्होंने कहा कि इसके बाद वही हुआ जो पहले भी हुआ था, एक विधायक ने पूजा–पाठ शुरू करवाया, लेकिन अगले ही दिन हार्टअटैक से उनकी मौत हो गयी। इस पर बेंच थोड़ा असहज हो उठी और उन्होंने उनसे पूदा कि आप हमसे चाहते क्या हैं ? इस पर स्वामी ने कहा कि माई लॉर्ड! आप यह फैसला दें कि रामसेतु धार्मिक भावनाओं और विश्वास का मामला है और सेतुसमुद्रम्–प्रोजेक्ट को रद कर दें। उन्होंने कहा कि हम श्रीलंका और भारत के बीच लघु जलमार्ग बनाने के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा अलाइनमेण्ट चुना जाय, जिससे रामसेतु को कोई नुकसान न पहुँचे। बहस के दौरान स्वामी ने ऐसे अनेक दस्तावेजों का उल्लेख किया, जिनमें सरकार ने रामसेतु के अस्तित्व को स्वीकारा है। प्रधानमन्त्री के कार्यालय से जारी की गयी एक पुस्तक में रामसेतु के मानवनिर्मित होने की बात को माना गया है। तमिलनाडु जाने वाले शताब्दी टे्रेन में भी यह लिखा रहता है कि रामेश्वरम् के पानी में भगवान् राम के चरण कमलों का आशीर्वाद है, क्योंकि यहीं से उन्होंने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई कर सीता को छुड़ाया था। उन्होंने कहा कि यदि लोगों की भावनाओं और परम्पराओं की खातिर तमिलनाडु सरकार जल्ली कट्टू (बुल फाइट) जारी रख सकती है तो रामसेतु को छोड़कर कैनाल बनाने के लिये दूसरा अलाइनमेण्ट क्यों नहीं अपनाया जा सकता है ?

साभार : कल्याण समाचार (श्री देवेन्द्र जी शर्मा)

 अन्य तथ्य

भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने किया था रामसेतु का वर्णन
रामसेतु पर बापू ने तोड़ी चुप्पी, कहा – ‘राम से तू है’
रामसेतु तोड़ा तो भारत में विनाश सम्भव : शंकराचार्य‍
अशोक सिंहल द्वारा प्रधानमंत्री और सभी सांसदों को रामसेतु रक्षा के लिये विशेष पत्र
रामसेतु के आस–पास विशाल थोरियम भण्डार

श्रीराम के अस्तित्व को नकारना गम्भीर अपराध

केन्द्र ने कैसे नकारा राम का अस्तित्व – रामदेव
थोरियम भण्डार का रक्षक है – रामसेतु
रामसेतु तोड़ने का प्रयास राष्ट्रीय अपराध है
दो वैज्ञानिक अध्ययनों का दावा

 

भूतपूर्व  राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने किया था रामसेतु का वर्णन

माता अमृतानंदमयी मठ द्वारा पिछले दिनों अमृत सेतु का निर्माण किया गया था। भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम उस कार्यक्रम में उपस्थित थे। वहाँ उन्होंने जो भाषण दिया उसका एक अंश इस प्रकार है –

‘‘अम्मा की उपस्थिति में अमृतानंदमयी मठ में आकर मुझे आनन्द हुआ है। मेरा सौभाग्य है कि मैं कोच्चि के निकट अरब सागर के इस ‘बैक्वाटर’ में प्रायद्वीप क्षेत्र को मुख्य भूमि से जोड़ने वाले अमृत सेतु के उद्घाटन कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ हूँ। ..... मैं जब अमृत सेतु को देखता हूँ तो मुझे रामेश्वरम की याद आती है। कहा जाता है कि रामेश्वरम धनुष्कोटि में राम ने एक सेतु बनवाया था। रामायण में उल्लेख है कि रावण के विरुद्ध युद्ध के लिए लंका पर चढ़ाई करने हेतु राम की वानर सेना ने देखते ही देखते सेतु बांध दिया था। उपग्रह चित्र दर्शाते हैं कि रामेश्वरम और श्रीलंका के बीच सेतु के भग्नावशेष अब भी मौजूद हैं।’

[ 29 अप्रैल 2007 ]

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रामसेतु पर बापू ने तोड़ी चुप्पी, कहा – ‘राम से तू है’

मोरना, (मुजफ्फरनगर) जा.का. : आखिर अंतर्राष्ट्रीय संत मोरारी बापू ने राम सेतु पर अपनी चुप्पी तोड़ ही दी। एक साधक की चिट्ठी पढ़ते हुए अपने जवाब में बापू ने कहा कि राम सेतु है या नहीं, यह सवाल करने वाले को पहले इस बात का चिंतन करना चाहिए कि राम से ही वह है। यदि राम न होते तो उसका अस्तित्व ही नहीं होता। उन्होंने करुणा निधि का नाम लिए बगैर कहा कि उनको राम सेतु पर प्रतिक्रिया करने का कोई अधिकार नहीं है। पौराणिक तीर्थ शुक्रताल में मानस गोपी गीत में अपनी अमृतमयी वाणी की वर्षा करते हुए मोरारी बापू ने यह कहा।


[ 17.10.07 दैनिक जागरण ]

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रामसेतु तोड़ा तो भारत में विनाश सम्भव : शंकराचार्य

वृन्दावन समाचार : थोरियम पदार्थ के लिए भारत अन्य देशों की ओर हाथ फैला रहा है, लेकिन अपने ही देश में रामसेतु के नीचे उपस्थित दुनिया के 80 प्रतिशत थोरियम को नष्ट करने पर तुला हुआ है। अगर रामसेतु तोड़ा गया तो भारत में आने वाले विनाश को रोकना असम्भव होगा। बुर्जा रोड स्थित हरिहर आश्रम में पत्रकारों से बातचीत करते हुए गोवर्धनपीठ पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि 1480 तक रामसेतु के दर्शन सुलभ थे, लेकिन उसके बाद प्रकृति की अथल–पुथल में रामसेतु अंदर समा गया। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार जिस रामसेतु को तोड़ने पर आमादा हो रही हे, वह रामसेतु सुनामी जैसी विनाशकारी लहरों से मुकाबला करने में सक्षम है। यही नहीं अगर रामसेतु तोड़ दिया गया तो तीन हजार से भी अधिक वनस्पतियाँ नष्ट हो जायेंगी जो मनुष्य के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। महाराजश्री ने कहा कि श्रीलंका द्वारा इस सम्बन्ध में अनेकों बार आपत्ति उठाई गई है, लेकिन उसे हर बार नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने कहा कि रामसेतु पर बनाये जाने वाले नये मार्ग से राह तो आसान हो जायेगी। उससे आर्थिक रूप से कोई फायदा नहीं होगा। महाराज श्री ने कहा कि रामसेतु मुद्दे पर हिन्दुओं को ही नहीं अपितु देश के प्रत्येक नागरिक को एकजुट होकर इसका विरोध करतें हुए ऐसी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहिए ताकि कोई अन्य भी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का ऐसा कुत्सित प्रयास न कर सके।

[ दैनिक जागरण 10–10–07 ]

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अशोक सिंहल द्वारा प्रधानमंत्री और सभी सांसदों को रामसेतु रक्षा के लिये विशेष पत्र
ब्र सरोवर की तरह रामसेतु को भी प्राचीन धरोहर घोषित किया जाए

विश्व हिन्दू परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अषोक सिंहल ने एक लम्बे और विशेष पत्र में प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वे देश, समाज और धर्म के प्रति अपनी जिम्मेदाीर निभाते हुये रामसेतु की रक्षा के लिए तुरंत निर्णय लें। इस पत्र में श्री अशोक सिंहल ने विज्ञान की अपनी शिक्षा और सेतु समुद्रम प्रकल्प के सभीपहलुओं के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए लिखा है कि भारत सौभाग्यशाली है कि उसके पास विश्व की महानतम धरोहर के रूप में आदिकाल में मानव निर्मित रामसेतु है। हम सेतु समुद्रम प्रकल्प का विरोध नहीं कर रहे हैं, यह प्रकल्प रामसेतु तोड़े बिना भी पूरा किया जा सकता है। राम सेतु तोड़ने से न केवल विश्व के सबसे बड़े थोरियम भण्डार नष्ट हो जाएंगे बल्कि सुनामी की लहरों से केरल की रक्षा सम्भव नहीं हो पाएगी और उससे बढ़कर, भारत दुनिया की एक महान धरोहर खो बैठेगा। इस पत्र में श्री अशोक सिंहल ने लिख है कि जिस प्रकार कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर को महाभारतकालीन प्राचीन धरोहर घोषित करते हुए उसकी रक्षा हेतु, अभिवद्र्धन हेतु सरकार ने विशेष व्यवस्था की है उसी प्रकार रामसेतु को भी वैश्विक धरोहर के रूप में मान्य करते हुए सेतु समुद्रम प्रकल्प का वैकल्पिक मार्ग अपनाया जाए और वर्तमान मार्ग को छोड़ दिया जाए। इस पत्र में श्री अशोक सिंहल ने रामायण, महाभारत और भगवद्गीता से रामसेतु के संदर्भ में अनेक उद्धरण प्रस्तुत करे हुए प्रधानमंत्री और सांसदों की आत्मा जगाने का प्रयास किया है।

[ 29 अप्रैल 2007 पांचजन्य ]

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रामसेतु के आस–पास विशाल थोरियम भण्डार

सेतु समुद्रम् परियोजना से मन्नार की खाड़ी में जीवन–जन्तुओं एवं पौधों की 3600 प्रजातियां और मूंगा भण्डार के नष्ट हो जाने की सम्भावना है। खुदाई के दौरान निकलने वाले कचरे से समुद्र में प्रदूषण फैलेगा और लहरों की धारा में अनापेक्षित बदलाव आयेंगे, जिससे सुनामी का खतरा बढ़ने की आशंका है। रामसेतु के आस–पास थोरियम का विशाल भण्डार है जो एक शताब्दी तक भारत की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है।

ज्योतिष पीठाधीश्वर ज.गु. शंकराचार्य
अनन्तश्री विभूषित स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी

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श्रीराम के अस्तित्व को नकारना गम्भीर अपराध

–संत विजय कौश्ला जी,
प्रख्यात कथाकार

संत विजय कौशल जी महारजा ने पांचजन्य प्रतिनिधि​ से एक भेंट में कहा, ‘भगवान श्रीराम–कृष्ण के धर्मप्राण देश मे श्रीराम व रामायण के अस्तित्व को नकारने का दुष्प्रचार गम्भीर राष्ट्रीय अपराध है। श्रीराम तो आस्थावानभक्तों की रग–रग में बसे हुए हैं। श्रीराम जी के प्रति भक्तों की आस्थाकोभला कौन डिगा सकता हे ? यदि संसार अस्तित्व को नकारने लगें तो इससे क्यासूर्य के अस्तित्व पर प्रभाव पड़ सकता है ? ‘संत विजय कौशल जी ग्राम सेवा समिति द्वारा अयोजित रामकथा हेतु पिलखुवा (उ0प्र0) आए थे। संत श्री विजय कौशल जी महारजा ने आगे कहा, ‘श्रीराम और रामचरित मानस के बिनाभारत निष्प्राण है। भारत और भारतीय संस्कृति के शत्रु ही भगवान श्रीराम व श्रीराम कथाको काल्पनिक बताने की धृष्टता कर सकते हैं।’

श्री एच.आर. लक्ष्मीनारायण ने रामेश्वरम् मन्दिर के पूर्व धनुषकोटि के पास नहर बनाने का सुझाव रखा था।

मई 1968 में सी.वी. वेंकटेश्वरन् ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि –

‘‘अनादिकाल से सेतु के बारे में लोगों का विश्वास है कि इसे भगवान श्रीराम ने लंका जाने के लिए बनवाया था। भारतीयों के मन में यह बात गहराई तक समायी हुई है और यह उनके लिए बताए जारहे प्रत्येक लाभ से कहीं ऊपर है। भू–वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत और श्रीलंका के बीच में एक पक्के सेतु की लम्बी श्रृंखला मौजूद है। समुद्री सतह से ठीक नीचे एक के ऊपर एक ऐसी दो संरचनायें हैं जिनमें से नीचे स्थित संरचना समुद्री चट्टानों तथा ऊपर की संरचना तोड़े गए शिलाखण्डों और समद्री रेत के मिश्रण से बनी हुई है यह संरचना आज भी समुद्र के अन्दर विराजमान है और यह भारत तथा लंका के बीच एक अटूट पंक्ति के रूप् में समुद्र में कुछ ही नीचे स्थित है।’’

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केन्द्र ने कैसे नकारा राम का अस्तित्व – रामदेव

नई दिल्ली। रामसेतु के मुद्दे पर केन्द्र सरकार की ओर से पुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे परयोग गुरु बाबा रामदेव भड़क उठे हैं। रामदेव ने केन्द्र सरकार के हलफनामे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इसके जरिये हिंदू धर्म के महानायक राम के अस्तित्व और चरित्र को नकारने की कोशिश की गई हे। जिससे लोगों की आस्था को चोट पहुंची है।

उन्होने साफ कहा कि क्या केन्द्र सरकार किसी औरधर्म के महापुरुष के चरित्र को नकारने का साहस कर सकती है ? अमेरिका, ब्रिटेन, युगांडा, तंजानिया और केन्या में योग शिक्षा देकर स्वदेश लौटे बाबा रामदेव ने बुधवार को कहा कि  मंगलवारको सवदेश लौटे हैं और यहाँ आते ही पता चला कि हमारी अपनी सरकार यह मानती है कि हिंदुओं के महानायक और महापुरुष राम का चरित्र काल्पनिक है और रामायण ग्रंथ भी काल्पनिक है। न तो कभी सीता का अपहरण हुआ न राम–रावण का युद्ध। इससे जाहिर होता है कि रामसेतु को तोड़ने के लिएसरकार धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने का सहाराले रही है। सरकार के इस कदम पर उन्हें सख्त ऐतराज है। योग गुरु ने कहा कि रामसेतु को तोड़ना है या नहीं यह एक अलग मुद्दा हो सकता है लेकिन इसके लिए किसी धर्म की आस्था पर चोट पहुंचाना सरासर गलत है।

[ 13 सितम्बर 2007 अमर उजाला ]

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थोरियम भण्डार का रक्षक है – रामसेतु

हिन्द महासागर में उठने वाली लहरें पुन: अवरोधों से टकराकर निर्मित होने वाली विपरीत लहरों के कारण ही भारी तत्व भातरीय समुद्री तटों तक पहुँचते हैं। श्री रामसेतु ही वह अवरोधक है जो महासागरीय लहरों के थपेड़ों को झेलता हुआ बहुमूल्य भारी तत्वों को आगे बहने का रास्ता देने की जगह भारतीय तटों की ओर धकेल देता है। जरा कल्पना कीजिए जब रामसेतु तोड़ दिया जायेगा तब क्या भारी तत्व सागर की लहरों के साथ विशाल मात्रा में भारतयी तटों पर एकत्रित हो सकेंगे ? रामसेतु को ध्वंस कर सरकार देश की परमाणु सम्प्रभुता के महान भण्डार को खतरे में डाल रही है। इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे कि एक ओर सरकार परमाणु ईंधन के लिए अमेरिका से अमेरिकी शर्तो पर समझौता करती है, किन्तु उसे अपने परमाणु ईंधन के महान भण्डार की सुरक्षा की तनिक भी परवाह नहीं है।

क्या है थोरियम ?

थोरियम विश्व की बहुत ही दुर्लभ धातु है, जो स्लेटी रंग की धात्विक चमक दिखाती हैं यह हवा में गर्म करने पर बहुत ही चमकदार रोशनी से जलती है। इसका नाम सकेन्डीनेविया के लोक विख्यात युद्ध देवता थोर के नाम पर रखा गया है। भारत के पास दुनियाँ का सबसे बड़ा और विशालतम थोरियम भण्डार है। भारतीय परमाणु वैज्ञानिकों की एक टीम ऐसा परमाणु रियेक्टर तैयार करने में जुटी है, जो थोरियम से चलेगा।

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रामसेतु तोड़ने का प्रयास राष्ट्रीय अपराध है

[  लल्लन प्रसाद व्यास ]


अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व रामायण सम्मेलन

विश्व रामायण सम्मेलन के संयोजक तथा सुप्रसिद्ध विद्वान श्री लल्लन प्रसाद व्यास ने इस बात पर क्षोभ व्यक्त किया कि एक ओर जहाँ पूरे विश्व में भगवान श्रीराम के आदर्शों से प्रेरणा ली जा रही है वहीं भारत में उनके द्वारा निर्मित श्रीराम सेतु को तोड़ने का प्रयास किय जा रहा हे। लाखो वर्षपुरानी विरास को नष्ट किया जाना राष्ट्रीय अपराध है। श्रीराम सेतु की हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए।

श्री व्यास गत 29 अगस्त को कुरुक्षेत्र में विद्या भारती अ.भा. शिक्षा संस्थान द्वारा्रपज्ञा सदन में ‘रामचरित मानस एवं विश्व हिन्दी सम्मेलन’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में विचार व्यक्त कर रहे थे। श्री व्यास ने कहा कि मैंने संसार के अनेक देशों मे विश्व रामायण सम्मेलनों के दौरान यह अनुभव किया कि भगवान श्रीराम के आदर्श जीवन चरित्र पर सभी मुग्ध हैं। रूस जैसे देश में हिन्दी विद्वान बारान्निकोव ने रामायण का रूसी भाषा में अनुवाद किया।

न्यूयार्क में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में सम्मानित श्री लल्ला प्रसाद व्यास ने कहा कि हिन्दी भाषा का दर्शन भारतीय संस्कृतिक दर्शन है। वसुधैव कुटुम्बकम् का दर्शन है।

संस्कृत व अन्य भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के रीडर डॉ. सुरेन्द्र मोहन मिश्र ने विचार गोष्ठी की अध्यक्षता की। संस्थान ने शोध विभागाध्यक्ष डा. हिम्मत सिंह सिन्हा ने श्री लल्लन प्रसाद व्यास तथा गोष्ठी में उपस्थित वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार श्री शिव कुमार गोयर कापरिचय कराया। संयोजक श्री राजेन्द्र सिंह ने कार्यक्रम का संचालन किया। इस अवसरपर अनेक इतिहासकार, पुरातत्वविद् तथा शिक्षाविद् उपस्थित थे।

[ पांचजन्य, 16 सितम्बर 2007 ]

यथार्थ से आगे है आस्था सदियों से मानव मन में बसे मिथकों की महत्ता पर प्रकाश डाल रहे हैं डॉ. महीप सिंह भारत सरकार के भू विज्ञान ने सिद्ध किया यह सेतु मानव निर्मित

– कल्याण रमन

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दो वैज्ञानिक अध्ययनों का दावा

प्रकृति ने नहीं बनाया था रामसेतु

– मदन जैड़ा

नई दिल्ली। राम के अस्तित्व और राम–रावण युद्ध पर सरकार जो भी कहे लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि भारत–श्रीलंका के बीच लगभग छह हजार साल पूर्व आवाजाही के उद्देश्य से सेतु का निर्माण किया गया था जिसका ढांचा एडम ब्रिज के रूप में आज भी मौजूद है। अध्ययन इस तथ्य को भी झुठलाते हैं कि एडम ब्रिज प्राकृतिक है। लेकिन वैज्ञानिक अब तक यह साबित नहीं कर पाए कि इसे इंसानों ने बनाया या वानरो ने।

अर्थ साइंसेज मंत्रालय के जरिये 2004 और 2007 में हुए दो अलग–अलग अध्ययनों के अनुसार एडम ब्रिज के दोनों तरफ यानी श्रीलंका और भारत में मानवीय गतिवि्दियों के संकेत मिलते हैं इसलिये यह सम्भावना है कि हमारे पूर्वज छह हजार साल पहले तक आवाजाही के लिए इस पुल का इस्तेमाल करते रहे हैं। बाद में ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से यह पुल डूब गया। पूर्ववर्ती एनडीए सरकार के दौरान नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ओशियन टेक्नोलॉजी (एनओआईटी) चेन्नई ने भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के साथ मिलकर एडम ब्रिज पर गहन पड़ताल की। तब एनओआईटी के निदेशक रहे जाने–माने भूगर्भ विज्ञानी डॉ. बद्रीनारायण के अनुसार वैज्ञानिकों की एक टीम विशेष जहाज के जरिये इस पुल के करीब पहुंची। उसके बाद छोटी नौकाओं से वैज्ञानिक पुल तक पहुंचे। टीम ने एडम ब्रिज पर 10 स्थानों पर 200 मीअर गहरे छेद कर चट्टानों के नमूने उठाए। बाद में इनकी प्रयोगशाला में जांच की गई। इसमें ऊपर के छह मीटर के चट्टानों के टुकड़े समुद्री बालू से निर्मित थे। लेकिन उसके बाद के पांच मीटर की गहराई से उठाए गए चट्टानों के नमूने ऐसी बालू के थे जो समुद्र में नहीं बल्कि सतह पर पाई जाती है।

आह्वान

हमारी आस्था, विश्वास, राष्ट्रीय पहचान तथा देश की सुरक्षा और प्र्यावरण के महान रक्षक श्री रामसेतु पर उन आतताई–बर्बर विदेशी विधर्मी हमलावरों ने भी कभी कुदृष्टि नहीं डाली जिनका भारत से दूर–दूर का भी रिश्ता नहीं था। लेकिन जो भारत में जन्में, पल–बढ़े और जिन्होंने भारत का नमक खाया, जिनके घरों में आज भी हिन्दू विधि–विधान से पूजा होती है, वे न केवल श्री रामसेतु तोड़े जाने के विषय में खामोश हैं बल्कि इस काम में विकृत और छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सहयोग भी दे रहे हैं।
आइये ! करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक श्री रामसेतु का विध्वंस करने वाली योजना को ही ध्वस्त करने का संकल्प करने वाली योजना को ही ध्वस्त करने का संकल्प लें और सेतुरक्षा के लिए वीर हनुमान से प्रेरणा लेते हुए भगवान श्रीराम के इस कार्य में प्राणापण से जुट जायें।

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होए न प्रीत।।

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