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आनलाइन संत

भगवान् आंजनेय

–ब्रहार्षि विश्वात्मा बावरा

श्रीराम कार्य की गुरुता को देख भगवान महेश्वर उनके सहायतार्थ स्वयं श्रीकपीश्वर हनुमान के रूप में अवतरित हुए। भूतेश्वर ने अपने अवतरण का माध्यम चुना, अपनी अनन्य निष्ठावान उपासिका देवी अंजना को। शिवपुराण के अनुसार देवी अंजना महर्षि गौतम की कन्या है। पितृ सम्बन्ध से परिचय देने का अभिप्राय है कि वे अविवाहिता तपस्विनी ब्रचारिणी हैं और परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए अनन्यभाव से उनकी आराधना में निरत हैं। तभी तो वह महादेवी सप्तर्षियों के द्वारा कर्णरंध्र से प्रदान किए गए प्रलयंकर के प्रचंड तेज को धारण करने में सक्षम हो सकी हैं। भगवान् शिव स्वयं ही जिस की गोद को पावन बनाने के लिए पुत्र रूप में प्रकट हुए हों वह सामान्य नारी कैसे हो सकती हैं ? वह आद्यशक्ति भगवती स्वयं अपने प्राणेश परमेश्वर के प्रचंड तेज को धारण करने के लिए महर्षि गौतम के गृह अंजना के रूप में जन्म लेती हैं।

जिस समय इन्द्र के छल से अहिल्या का सतीत्व भंग होता है और इस कुकृत्य को जानने पर भी अहिल्या महर्षि गौतम से छिपाना चाहती है, महर्षि उसे शाप दे देते हैं, आश्रम वीरान हो जाता है, महर्षि उत्तराखण्ड के लिए प्रस्थान करते हैं, उसी समय उनकी पुत्री देवी अंजना उदयाचल पर जाकर परमेश्वर की आराधना में निमग्न हो जाती है। वहीं पर वे परमेश्वर की कृपा भाजन बनकर श्रीहनुमान को जन्म देती हैं। श्रीहनुमान जी दिव्य मौजी, मेखला, यज्ञोपवीत, कोपीन तथा कुंडल के साथ ही अद्भुत बालक के रूप में अवतरित होते हैं। यह कितनी अद्भुत लीला है परमेश्वर की कि स्वयं श्रीबैकुंठनाथ के मोहिनी रूप को देखकर विमुग्ध हो गए और उसी गुग्धता में स्खलित हुए शैव तेज के द्वारा अवतरित आपका दिव्यांश श्रीहनुमान के रूप में जन्म से ही अखंड ब्रचर्य के चिन्हों से सुशोभित हुआ। श्रीहनुमान जी की अजय शक्ति, प्रभु श्रीराम में अनन्य भक्ति, ब्रहाविद्या का आगाध ज्ञान तथा लोक कल्याणार्थ सदैव कर्म में प्रवृत्ति, ये सभी कुछ स्वयं में अनुपम तथा अद्वितीय हैं। इन सभी देव–दुर्लभ दिव्य गुणों का मूल स्रोत आपका अखंड नैष्ठिक ब्रचर्य का व्रत है, इसमें सन्देह नहीं।

आंजनेय केवल शारीरिक ब्रचर्य के ही निष्ठावान व्रती नहीं हैं वे चेतना के उस क्षितिज पर सदैव निवास करते हैं जहाँ पर ब्रचर्य शब्द स्वयं में ही सार्थकता प्राप्त करता है, जिसके लिए जाबालदर्शनोपनिषद् में भगवान् दत्तात्रेय ने अपने प्रिय शिष्य सांकृति मुनी से कहा है ‘‘ब्रभावेमन्स्चार्य ब्रहाचर्य परंतप:।’’ मन को परब्रह्म परमात्मा के चिन्तन में संचरित करना, लगाए रखना ही सर्वोत्तम ब्रह्मचर्य है। श्रीआंजनेय का मन सदैव अपने परमाराध्य परमात्मा श्रीराम के ही चिन्तन में निरत रहता है। उनके रोम–रोम से सदैव परात्पर ब्रह्म श्रीराम के तारक बीज मंत्र का गुंजार होता रहता है। इस प्रकार से शारीरिक तथा आध्यात्मिक दोनों प्रकार का नैष्ठिक ब्रचर्य ही कपीश्वर की अनन्त सामथ्र्य का स्रोत है। बाल्यकाल में सुन्दर फल जान उदयकालीन भगवान् भास्कर को निगलने का महापराक्रम, राहु, ऐरावत तथा इन्द्र के मद का मर्दन आदि पावन क्रीड़ाएं प्रलयंकर के लिए केवल विनोद मात्र है। वैदिक मर्यादा की सुरक्षा के लिए ही भगवान् भास्कर का शिष्यत्व स्वीकार कर आप वेद वेदांग सहित समग्र विद्या के आगार हो जाते हैं ज्ञानिनामाग्रगण्य को इससे भी पूर्ण सन्तुष्टि नहीं होती। अन्त में अपने परम इष्ट परमाराध्य परात्पर देव श्रीराम के पावन चरणार्विन्दों में जिज्ञासु भाव से उपस्थित हो ब्रह्मविज्ञान की दीक्षा ग्रहण करते हैं। आप श्रीराघव के प्रिय सेवक, सखा ही नहीं शिष्य भी हैं, ऐसा मुक्तिकोपनिषद् से ज्ञात होता है।

श्रीआंजनेय का अप्रतिम पराक्रम विश्व विदित है। भारत का तो बच्चा–बच्चा उनकी अद्भुत लीलायुक्त महिमा का गान करता है। विविध प्रकार का आधिव्याधि से पीडि़त दीन–हीन, दुखित मानव के लिए कपीश्वर का नाम ही एकमात्र अवलम्बन है। संतवर की यह घोषणा ‘‘भूत पिसाच निकट नहीं आवे। महाबीर जब नाम सुनावें। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।’’ सदैव अक्षुण्ण रूप से जनमानस में गूँजती रहती है। भला, संकट ग्रस्त जीवों के लिए संकट मोचन के सिवाय और दूसर कौन अवलम्बन हो सकता है ?

आदिकवि के आदि महाकाव्य से लेकर आधुनिक कवियों तक की कृतियों के परमाश्रय परात्पर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का परम पावन चरित्र है। उस पावन की पूर्णता में आंजनेय का अमित पराक्रम, अगाध ज्ञान, अद्भुत कार्य कौशल्य ही परम कारण है। श्रीहनुमान के पावन चरित्र के अभाव में श्रीराम चरित्र अधूरा ही रह जाता। इसलिए आदि कवि महर्षि वाल्मीकि से लेकर संतवर गोस्वामी तुलसीदास तक के श्रीराम चरित्र गायकों ने ‘राम से अधिक राम का दासा’ की घोषणा करते हुए श्रीकपीश्वर की वंदना और उनकी पावन लीला का गानकिया है।

शिव पुराण के अतिरिक्त वायु पुराण, स्कन्ध पुराण, वैष्णवखंड, दपुराण आदि ग्रन्थों में भी श्रीहनुमदावतार की कथा का विस्तृत वर्णन है। आदि कवि ने अपने आदि काव्य रामायण के उत्तर कांड में बड़े विस्तार के साथ समीर सुमन के रूप में श्री हनुमान जी के जन्म तथा जीवन लीला का वर्णन कियाहै। महर्षि वाल्मीकि वर्णित हनुमान चरित्र में कहीं भी रुद्रावतार का जिक्र नहीं है। वाल्मीकि रामायण मे देवी अंजना वानर श्रेष्ठ कुंजर की पुत्री तथा सुमेरु पर्वत के महाप्रतापी राजा कपि श्रेष्ठ केसरी की धर्मपत्नी हैं। देवी अंजनाके गर्भ से स्वयं पवनदेव अपेन अंश से श्रीहनुमान के रूप में जन्म लेते हैं इस आदि महाकाव्य में देवी अंजना को पुन्जिकस्थला नाम की अप्सरा बताया है जो ऋषि के शाप से वानर जाति में कपीश्वर कुंजर की कन्या के रूप में जन्म लेती है। महर्षि वाल्मीकि ने श्रीमारुति के बाल चरित्र का विस्तार से वण्रन किया है। श्री आँजनेय बाल्यावस्था में क्षुधा पीडि़त होने पर प्रात:कालीन सूर्य को सुन्दर फल समझ कर खाने के लिए सहस्रों योजन की दूरी को एक ही छलाँग में नाप लिए और सूर्यदेव के पास पहुंच गए। जिस दिन यह घटना घटी, वह अमावस्या तिथि थी, उसी दिन राहू सूर्य को ग्रसने के लिए आ रहा था। राहू को आता देख मारुति सूर्य को छोड़ उसी को विशला फल जान पकड़ने के लिए चल पड़े। उसने अपनी प्राण रक्षा के लिए देवराज इन्द्र की पुकार की। देवराज इन्द्र ऐरावत हाथी पर सवार होकर राहू की रक्षा के लिए आगे बढ़े तो बालक हनुमान ऐरावत को ही विशाल फल जान उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़े। उनके पराक्रम को देख घबराये हुए इन्द्र देव ने उन पर वज्र से प्रहार कर दिया जिसमें वे मूच्छित हो एक गिरि शिखर पर गिर गए। वज्र प्रहार से उनकी हनु भी टेढ़ी हो गई। अपने प्रिय पुत्र को मूच्र्छित देख वायुदेव कुपित हो गए और उन्होंने त्रिलोकी को त्रस्त करने के लिए अपनी गति ही रोक ली। वायु की गति रुक जाने से त्रिलोकी में हाहाकार मच गया और देव, दानव, मानव सहित सभी चराचर जीव वायु विहीन हो, घोर यातनासे पीडि़त हो अपनी प्राण रक्षा के लिए त्राहि–त्राहि करने लगे। त्रिलोकी के समस्त प्राणियों की पीड़ा को देख स्वयं ब्रदेव समस्त देवगणों के साथ उस स्थान पर गए जहाँ पर अपने मूच्र्छित पुत्र को गोद में लिए वायु देव शोकाकुल हो रहे थे। ब्रह्रदेव के स्पर्श से ही बालक मारुति मूच्र्छा विगत हो पूण्र स्वस्थ हो गए। फिर ब्रदेव की प्रेरणा से सभी देवों ने उन्हें अजर, अमर अजेय होने का वर प्रदान कर त्रिलोकी के उनके पिता वायुदेव  को सन्तुष्ट किया।

श्रीमारुति के बाल चरित्र का यह वर्णन भगवान् श्रीराम की जिज्ञासा की पूर्ति हेतु महर्षि अगस्त ने किया है। प्रभु श्रीराम की यह जिज्ञासा थी कि महाप्रतापी मारुति के संरक्षण मे रहते हुए भी सुग्रीव बाली द्वारा भयाकुल हो दर–दर भटकते रहे, इसका कारण क्या था ? श्रीहनुमान जी ने बाली से सुग्रीव की रक्षा क्यों नहीं की, उसे अपने प्रताप से भस्म क्यों नहीं कर दिया ? इसमें सन्देह नहीं कि वानर राज बाली महापराक्रमी था और राक्षस राजा रावण से उसकी मैत्री थी, फिर भी श्रीराम कहते हैं कि –

अतुल बलमेतद वै वालिनो रावणस्य च।
नात्वेताभ्याँ हनुमता समं त्विति मतिर्मम।।

(वा0 7–35–2)

यह सत्य है कि बाली और रावण दोनों में अतुल बल था किन्तु मेरा विचार है कि इन दोनों का बल भी श्रीहनुमान जी के बल की बराबरी नहीं कर सकता था। श्रीमारुति के महापराक्रम का वर्णन करते हुए प्रभु श्रीराम कहते हैं कि –

न कालस्य न शकस्य न विष्णोर्वित्तपस्य च।
कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमत:।।

(वा0 7–35–8)

युद्ध में श्रीहनुमान जी के जो पराक्रम देखे गए हैं वैसे पराक्रम पूर्ण कर्म न तो काल के न इन्द्र के, न विष्णु के और न वरुण के ही सुने जाते हैं। कृतज्ञता व्यक्त करते हुए प्रभु राम अपना ही उदाहरण देते हुए कहते हैं –

एतस्य बाहुवीर्येण लंका सीता च लक्ष्मण:।
प्राप्ता मया जयश्चैव राज्यं मित्राणि बान्धवा:।।

(वा0 7–35–9)

मैंने तो इन्हीं के बाहुबल से विभषण के लिए लंका, शत्रुओं पर विजय, राज्य, सीता, लक्ष्मण, मित्र और बन्धुओं को प्राप्त किया है, ऐसे महापराक्रमी हनुमान सुग्रीव के हितैषी थे, फिर भी बाली का वध कर सुग्रीव को संतापमुक्त क्यों नहीं किया ? इस जिज्ञासा के उत्तर में महर्षि अगस्त्य ने मारुति के जन्म से लेकर सूर्य के ग्रहण तथा राहू, एरावत, इन्द्र आदि के मद–मोचन की कथा का वर्णन किया और बताया कि देवताओं द्वारा वर प्राप्त कर बालक हनुमान में बड़ी उद्दण्डता आ गई और वे ऋषि आश्रमों में जाकर नाना प्रकार के उपद्रवों द्वारा उन्हें त्रस्त करने लगे। महाराज केसरी तथावायुदेव के बार–बार समझाने पर भी इनके स्वभाव में कोई अन्तर नहीं आया। मेरु पर्वत पर निवास करने वाले भृगु तथा अंगिराके वंशज महर्षियों को अपेन अमर्यादित कार्यो से त्रस्त करने लगे। फिर वे महर्षिगण दु:खित हो शाप दे दिये –

बाधसे यत् समाश्रित्य बलमस्मान् पल्वङ्गम।
तद् दीर्घकाल वेत्तसि नास्माक
शापमोहित:।।
यदा ते स्मार्यते कीर्तिस्तदा ते वर्धते बलम्।

(वा0 7–36–34–3)

हे वानर ! तुम जिस बल का आश्रय लेकर हमें बाधा पहुंचा रहे हो, उसे हमारे शाप से मोहित होकर तुम दीर्घ काल के लिए भूल जाओगे। जब कोई तुम्हारी कीत्र्ति का स्मरण दिला देगा तभी तुम्हारा बल बढ़ेगा। भृगु अंगिरा वंशी ऋषियों के शाप से विमोहित होने से श्रीमारुति को अपना पराक्रम विस्मृत हो गया था। इसीलिए बाली द्वारा सुग्रीव पर किए सभी अत्याचारों को चुनचाप देखते रहे। सीता की खोज में गए वानर वीरों के साथ श्रीजाम्बवान थे जो ब्रह्रांश से उत्पन्न हुए थे और उनको इस शाप का पता था। जब सभी वानर वीरों ने शत योजन विस्तृत विशला सागर को लांघने में अपनी असमर्थता प्रकट की तो ऋक्षराज जाम्वंत ने श्रीआंजनेय की उत्पत्ति तथा उनके बाल क्रीड़ा के महान कौतुकमय पराक्रम को जागृत किया और समुद्र लांघने के लिए प्रेरित करते हुए कहा –

उत्तिष्ठ हरिशादू‍र्ल लघयस्व महार्णवम्।
परो हि सर्वभूतानां हनुमन् या गतिस्त्तव।।

(वा0 4–66–36)

कपि श्रेष्ठ हनुमान ! उठो और इस महासागर को लांघ जाओ क्योंकि तुम्हारी गति सम्पूर्ण प्राणियों से बढ़कर है –

विषण्णा हरय: सर्वे हनुमन् किमुपेक्षसे।
विक्रमस्व महाबेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव।।

(वा0 4–66–37)

सभी वानर चिन्तातुर हैं, इनकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो ? महावेग शाली वीर जैसे भगवान् विष्णु ने त्रिलोकी को नापने के लिए तीन पग बढ़ाए थे उसी प्रकार तुम भी स्वयं को बढ़ाओ। जाम्बवान् बड़ी दृढ़ता से कहते हैं –

बल बुद्धिश्च तेजश्च सत्वं च हरिपुँगव।
विशिष्टं सवभूतेषु किमात्मान न सज्जेत।।

(वा0 4–66–7)

वानर शिरोमणे ! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियों से बढ़कर है, फिर तुम अपने आपको क्यों नहीं समुद्र लांघने के लिए सम्भालते, सजग करते। महर्षि वाल्मीकि कहते हैं – जाम्बवान की बात सुनते ही समीर सुवन कपि समूह के मध्य में खड़े हो गए और स्वयं के शरीर को भगवान् विष्णु के समान बढ़ाते वानर वीरों को शोक मुक्त होने का आश्वासन दिया –

विष्यति हि में रूपं प्लवमानस्य सागरम्।
विष्णों: प्रक्रममाणस्य तदात्रीन् विक्रमानिव।।
बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च में तथा।
अहं द्रक्ष्यामि वैदेही प्रमोदध्वं प्लवंगमा:।।

(4–67–25/26)


समुद्र लांघते समय मेरा वही रूप प्रट होगा जो तीनों पगों को बढ़ाते समय वामन रूपधारी भगवान् विष्णु का हुआ था। वानरों ! मैं बुद्धि से जैसे देखता हूं मेरे मन की चेष्टा भी उसी के अनुसार होती है। मैं वैदेही को अवश्य ही देखूंगा, अत: तुम सभी शोकमुक्त हो आनन्द मनाओ। प्रभु आंजनेय द्वारा किया गया इसके आगे का सम्पूर्ण कार्य त्रिलोकी में प्रसिद्ध है। कपीश्वर की महिमा का गान करते हुए महर्षि अगस्त्य कहते हैं –

पराक्रमोत्साहमतिप्रताप
सौशील्यमाधुर्यनयानयैश्च।
गाम्भीर्यचातुर्यसुवीर्यधैर्य
र्हनूमत: कोप्यधिकोस्ति लोके।।

(वा0 7–36–44)

त्रिलोकी में ऐसा कौन है जो पराक्रम, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, सुशीलता, मधुरता,नीति–अनीति का विवेक, गम्भीरता, चतुरता, उत्तम बल और धैर्य में श्रीहनुमान से अधिक हो। प्रभु श्रीराम स्वयं श्रीमुख से आंजनेय की महत्ता का गान करते हुए कहते हैं –

शौर्यं दाक्ष्यं बलं धैर्यं प्राज्ञता नयसाधनम्।
विकृमश्च प्रभावश्च हनूमति कृतालया:।

(वा0 7–35–3)

शौर्य, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव इन सभी सद्गुणों ने हनुमान के भीतर घर बना रखा है। आदि कवि महर्षि वाल्मीकि के आदिकाव्य श्रीरामायण का हृदय है सुन्दरकांड और वह कांड श्री आंजनेय के परम पराक्रम की गाथा से ही सुशोभित होते हुए स्वयं के नाम को सार्थक सिद्ध करता है।

वाल्मीकि के अतिरिक्त अनय सभी पौराणिक साहित्य में श्रीमारुति को रुद्रावतार के रूप में ही वर्णित किया है। स्कन्धपुराण में कहा गया है –

यौ वैचाकदशो रुद्रोहनुमानस महाकपि अवतीर्ण:।
सहायार्थ विष्णोरमिदं तेजस:।।

(स्क0 मा0के0 8–99–10)

ग्यारहवें रुद्र ही अमित तेजस्वी भगवान् विष्णु की सहायता के लिए अवतीर्ण हुए। इसी प्रकार से वायु पुराण में भी कहा है –

अश्वोन्यासिते पक्षे स्वात्मां भौमे चतुर्दशी।
मेष लग्नेजंनी गर्भात् स्वयंजातो हर: शिव।।

अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि, स्वाती नक्षत्र, मंगलवार, मेष लग्न में देवी श्रीअंजना के गर्भ से स्वयं कल्याणकर्ता भगवान् शिव अवतरित हुए। इस पुराण में अवतार से सम्बन्धित मास, तिथि, नक्षत्र, वार, लग्न तक का विवरण दिया है और स्वयं भगवान् शिव अन्जना के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, ऐसा कहा है। इन ग्रन्थों के बाद की रचना है आनन्द रामायण। उसके रचयिता ने पुराणों की रुद्रावतार की कथा को वाल्मीकि के समीर सुवन की गाथा के साथ समन्वित कर प्रभु आन्जनेय के जीवन चरित्र को एक नए रूप में व्यक्त किया है। इसमें देवी अन्जना वानर राज केसरी की प्राण वल्लभा प्रिय पत्नी हैं। वे शील, सौन्दर्य, सदाचार तथा पतिव्रत परायणा सती सहधर्मिणी हैं, पर अधिक काल तक कोई सन्तान नहीं होती तो वे सात हज़ार वर्षो तक भगवान् शंकर की आराधना करते हुए कठोर तप का अनुष्ठान करती हैं भगवान् शंकर प्रकट हो उन्हं अपने ग्यारहवें रुद्र रूप में उनके यहाँ पुत्र रूप में अवतरित होने का वरदान देते हैं और कहते हैं कि तुम यह मन्त्र ग्रहण करो, वायुदेव तुम्हे प्रसाद देंगे। पश्चात् वह रुद्रांश वायुदेव के द्वारा ही देवी अंजना को प्रदान किया जाता है और भगवान् आँजनेय अवतरित होते हैं। इस प्रकार श्रीमारुति रुद्रांश होने से, शंकर सुवन केसरी के क्षेत्रज पुत्र होने से केसरी नन्दन तथा अंजना में वायुदेव के द्वारा रुद्रांश प्रदान करने से पवनतनय आदि सभी नामों को सार्थक करते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपनी पावन कृतियों में श्रीमारुति की महिमा के गान में इन्हीं नामों का प्रयोग किया है। विनय पत्रिका में रुद्रावतार और पवन पुत्र दोनों ही मान्यताओं को साथ–साथ समन्वित रूप मे वर्णन करते हुए कहते हैं –

जयति मर्कटाधीस मृगराज विक्रम
महादेव मुदमंगलालय कपाली।
मोह–मद–मोह कामादि खल संकुल –
घोर संसार–निसि–किरन माली।।
जयति लसदजनादितिज कपि केसरी–
कस्यप–प्रभव–जगदार्तिहर्ता।
लोक–लोकप–कोक–कोकनद–सोहकर–
हंस हनुमान कल्याण कर्ता।।

(विनय पत्रिका 26)

हे वानरों के राजा, सिंह के समान पराक्रमी महादेव आनन्द और मंगल के आगर कपाली शिव के अवतार, आपकी जय हो। मोह, मद, क्रोध, काम आदि दुष्टों से व्याप्त घोर इस संसार रूप रात्रि को नाश करने वाले तुम साक्षात् सूर्यदेव हो, तुम्हारी जय हो। तुम्हारा जन्म अंजनी रूपी अदिति और वानरों में सिंह के समान केसरी रूपी कश्यप से हुआ है। तुम जगत के आर्ति को हरने वाले, लोक और लोकपाल रूपी चकवा–चकवी और कमलो का शोक नाश करने वाले श्रीहनुमान् तुम साक्षात् कल्याणकर्ता सूर्य हो, तुम्हारी जय हो। इसी प्रकार गोस्वामी जी रचित अनेकों छन्दों में रुद्रावतार पवन कुमार का वर्णन प्राप्त होता है जो कपिराज केसरी के क्षेत्रज पुत्र के रूप में अन्जनादेवी के गर्भ से प्रकट हुए हैं।

प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि त्रेतायुग में भक्तजन आनन्दवर्धन तथा धर्म संस्थापन हेतु जब–जब प्रभु श्रीराम इस धराधाम को धन्य बनाने के लिए अवतरित होते हैं तब–तब उनकी सेवा और सहायता के लिए भगवान् रुद्र का भी अवतरण होता है। जैसे प्रत्येक कल्प में प्रभु श्रीराम के माता–पिता का नाम दशरथ–कौशल्या होता है वैसे ही श्रीहनुमान जी की माता का नाम भी अन्जना ही होता है। देवांश से अवतीर्ण होने के कारण उनके अवतरण में स्त्री–पुरुष के संसर्ग की आवश्यकता नहीं होती। रुद्रांश शैव तेज कभी सप्तर्षियों द्वारा तो कभी वायुदेव के माध्यम से देवी अन्जना को प्रदान किया जाता हें चाहे वह देवी विवाहिता सती–साध्वी पतिव्रतपरायण किसी की धर्मपत्नी हो वा ब्रचारिणी। तपस्विनी रुद्रांश को अवतरित करने का सौभाग्य उन्हें ही प्राप्त होता है। गोस्वामी जी का यह कथन इस रहस्य का उद्घाटन करता है –

कल्प भेद हरि चरित सुहाये।
भान्ति अनेक मुनीसन्ह गाये।।
करिय न संसय अस्र उर जानी।
सुनिअ कथा सादर रति मानी।।

इस प्रकार कल्प भेद को दृष्टि में रखते हुए इन समस्त मान्यताओं का समाधान हो जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि भगवान् मारुति साक्षात् प्रलयंकार रुद्र हैं। विभिन्न कल्पों में उन्होंने विभिन्न प्रकार से स्वयं को अवतरित किया है। शक्ति स्वरूपा देवी अंजना ही उनके अवतार में सदैव माध्यम होती हैं वह कभी कुँजर, कभी गौतम के यहाँ पुत्री रूप से जन्म लेती हैं और कठोर तप के द्वारा त्रिपुरारि को प्रसन्न कर उनके परम तेज को धारण करती हैं परात्पर रुद्र श्रीहनुमान के रूप में उन्हीं की पावन गोद में क्रीड़ा करते हैं और भगवान् आंजनेय के नाम से प्रख्यात होते हैं।

प्रभु आंजनेय ने केवल त्रेता में सीता का ही शोक निवारण नहीं किया था, वे आज भी शोकाकुल जीवों के लिए एकमात्र आश्रय हैं। उन्होंने केवल श्रीराम काज के ही पूर्ण नहीं किया है, आज भी अनेकों आत्र्त जीवों के असम्भव कार्य को भी सम्भव बनाते हैं। वे केवल सुग्रीव–विभीषण को ही प्रभु के पावन चरणों की शरण में नहीं लाए बल्कि आज भी अनेकों दीन–हीन संसार ताप से संतप्त जीवों को प्रभु श्रीराम के पतित पावन पदार्विन्द का आश्रय प्रदान कर संतापमुक्त करते रहते हैं। जो भी व्यक्ति श्रद्धा–भक्ति युक्त हो आत्र्त हृदय से उनके प्रभु श्रीराम के पावन नाम का आश्रय ले पुकारता है, प्रभु मारुति तुरन्त आकर उस अनाथ को सनाथ कर देते हैं उनकी उपासना–आराधना की अनेकों विधियाँ शास्त्रों में वर्णित हैं। विश्वास है जिज्ञासु साधक तदनुसार आराधना कर परम शान्ति तथा कल्याण के परमाश्रय प्रभु मारुति के कृपा भाजन बनेंगें।

संकलनकर्ता : संजीव शर्मा

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