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आनलाईन दर्शन
 
स्वयंभू श्री टपकेश्वर महादेव मन्दिर
 
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पौराणिक प्राचीन, आदिअनादि तीर्थस्थल स्वयंभू शिवलिंग टपकेश्वर महादेव व श्री गुरु द्रोणाचार्य की तपस्थली द्रोण गुफा भारत में उत्तराखण्ड प्रान्त के देहरादून जिले के गढ़ी कैन्ट में है। मुख्य शहर से मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस स्थान तक परिवहन की सुविधा भी उपलब्ध है। यहाँ की व्यवस्था यहाँ के संस्थापक श्री श्री श्री 108 महंत मायागिरि जी महाराज व मुख्य पुजारी श्री भरत गिरि जी महाराज के द्वारा देखी जाती है।

भगवान टपकेश्वर महादेव का विशेष श्रंगार दर्शन हर माह की दोनों त्रयोदशी (प्रदोष व्रत) को बड़े धूमधाम से यहाँ मनाया जाता है। इस रोज़ पहले देवता गण भगवान शिव की आराधना एवं पूजन किया करते थे। जब देवताओं पर भगवान शिव की कृपा हुई तब देवेश्वर के रूप में दर्शन हुए। इस रोज़ भगवान शिव का देवेश्वर के रूप में रूद्राक्षमय श्रृंगार दर्शन किया जाता है एवं आरती एवं प्रसाद वितरण किया जाता है। इसी रूप की साल में एक बार भव्य शोभायात्रा श्रावण मास में निकाली जाती है।

देवताओं के बाद ऋषियों ने इस गुफा में तपस्या की। महाभारत काल के दोनों सेनाओं के कुलगुरू आचार्य द्रोणाचार्य ने भी यहाँ तपस्या की और भगवान शंकर ने तपेश्वर के रूप में दर्शन दिए एवं पाशुपत अस्त्र शस्त्र एवं ज्ञान प्रदान किए। यह श्रृंगार सायं के समय गुरुवार एवं रविवार को किया जाता है। तृतीय प्रसंग यहाँ का आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा की यह गुफा जन्मस्थली एवं तपस्थली है। इसी गुफा में अश्वत्थामा ने छह मास एक पांव के बल पर खड़े होकर तपस्या की थी और भगवान शंकर से दूध मांगा था।

पूर्णमासी के रोज़ शिवलिंग के ऊपर दूध की धारा बहने लगी। भगवान के चरणों से वह दूध को अश्वत्थामा ने पान किया और अपनी भूखप्यास मिटायी। भगवान शिव के साक्षात् दर्शन किये और अमरता का वरदान प्राप्त किया। कलयुग तक इस शिवलिंग पर दूध की धारा बहती रही। तब तक यह शिवलिंग दूधेश्वर के नाम से विख्यात रहा। हर पूर्णमासी में भगवान दूधेश्वर के रूप में भगवान टपकेश्वर का भव्य श्रृंगार एवं दुग्धाभिषेक किया जाता है। श्वेत रात्रि पूर्णमासी की ओर श्वेत शिवलिंग, श्वेत पुष्प, श्वेत प्रसाद, एक क्विंटल ग्यारह किलो दूध का भोग आरती के पश्चात् लगाया जाता है और भवनों में यह दूध का भोग वितरण किया जाता है।
 
 
अमृत तुल्य हर सोमवार को भगवान टपकेश्वर का ध्यान मुद्रा श्रृंगार किया जाता है क्योंकि कलयुग के लगते ही दूध का स्वार्थ के कारण प्रयोग भगवान सदाशिव का दुष्टों पर कुपित होना क्योंकि कलि के आगमन के समय प्रथम काल में सभी मनुष्य जाति वशीभूत हुई थी। तत्पश्चात् जल की बूँद शिवलिंग पर टपकने लगी और अखंड अभिषेक होने लगा, तत्पश्चात् भगवान शान्त मुद्रा में समाधिस्थ हुए। तबसे अब तक जल की बूँदे टपकती हैं। इसलिए भगवान सदाशिव को टपकेश्वर कहा जाता है और यह शिवलिंग स्वयंभू है।
 
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