Main page  About us Your Contribution Contact us Online Darshan Ram Naam Sangrah Bank Online Ram Bhakt Ram Bhakt Parivaar Discussion panel Online Bhent Stories and Articles Upasana Online Ramayan Online Sant
 






आनलाईन दर्शन
 
जय श्री सिद्धबली बाबा

परमपावन धाम श्री सिद्धबली धाम दिल्ली से लगभग 230 कि.मी. दूर एवं हरिद्वार से 60 कि.मी. दूर व नजीबाबाद जंक्शन से 30 कि.मी. दूर, उत्तरांचल प्रदेश के कोटद्वार शहर में स्थित है। यह स्थान तीन तरफ से वनों से ढका हुआ बड़ा रमणीय व पूज्य स्थान हैं यह स्थान श्री सिद्धबाबा (गुरु गोरखनाथ एवं उनके शिष्यों) का तपस्थान रहा है। यहाँ पर बाबा सीताराम जी, बाबा गोपाल दास जी, बाबा नारायण दास जी, महंत सेवादास जी जैसे अनेक योगियों एवं साधुओं का साधना स्थल रहा है। यहाँ पर ही परमपूज्य ‘‘फलाहारी बाबाजी ने जीवन पर्यन्त फलाहार लेकर ही कई वर्ष तक साधना की। कहा जाता है कि एक प्रसिद्ध मुस्लिम फकीर जो एक वली (इस्लाम के अनुसार जो शख्स इबादत करते–करते खुदा को पा लेता है। उसे वली कहते हैं।) थे ने भी कई वर्षो तक इस स्थान पर अपना निवास बनाया। यहाँ पर भक्तों द्वारा विश्वास किया जाता है कि जो भी पवित्र भावना से कोई मनोती श्री सिद्धबली बाबा से मांगता है, अवश्य पूर्ण होती है। मनोती पूर्ण होने पर भक्तजन भण्डारा आदि करते हैं। श्री सिद्धबली बाबा को बरेली, बुलन्दशहर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, बिजनौर, हरिद्वार आदि तक की भूमि का क्षेत्रपाल देवता के रूप में भी पूजा जाता है।

गोरखपुराण के उन्तालिसवें (39 वें) भाग में उल्लेख है कि श्री गुरु गोरखनाथ जी (श्री सिद्ध बाबा जी) अपने उत्तराखण्ड प्रवास के दौरान उन्होंने डुगराल (दुगड्डा) गाँव के निकट अपने इस तपस्थान (वर्तमान में श्री सिद्धबली धाम जहाँ पर सिद्धबाबा के शिष्य पावन नाथ जी स्थायी रूप से रहते थे) में कुछ दिन विश्राम करने हेतु रूके तो एक दिन श्री सिद्धबाबा ने अपने शिष्य पवन नाथ को समीपवर्ती आबादी (तत्कालीन समय में जिला बिजनौर में ही आबादी थी) में अनाज व दूध लेने भेजा। जब पवन नाथ गाँव में पहुँचे तब वहाँ के दुर्जन मसखरों ने उसे एक निर्धन ब्राण के घर भेज दिया और कहा कि उस ब्राण के यहाँ बहुत सी गाय हैं। वह नित्य ही साधु–सन्तों को दूध–दही से सेवा करता है, वहीं से आपको मनचाहा दूध व अनाज मिल जायेगा। पवन नाथ उन लोगों की बातों को सत्य जानकर निर्धन ब्राण के घर दूध मांगने हेतु जा पहुँचा।

वह ब्राण इतना गरीब था कि उसके घर में केवल एक ही फटी पुरानी धोती थी, जब उसकी पत्नी कुयें से पानी भरने जाती तो वह उस धोती को पहनकर जाती और ब्राण एक फटा हुआ कपड़ा लपेटकर घर में बैठा रहता। जब ब्राण भिक्षा मांगने जाता तब वह उस धोती को बांध जाता और उसकी पत्नी फटा कपड़ा लपेट कर घर में बैठी रहती। जब गरीब ब्राण के घर के दरवाजे पर पहुँचकर पवन नाथ ने अलख–अलख शब्द का उच्चारण किया तो ब्राण व उसकी पत्नी अपनी गरीबी को देख रो पड़े। पवन नाथ ने उन दोनों के आँखों से जलधारा बहते देख उनकी हीन व गरीबी दशा का भली प्रकार अंदाजा कर लिया और भली प्रकार समझ लिया कि गाँव के दुर्जनों ने इन गरीबों को लज्जित करने के लिये मुझे उनके दरवाजे पर भेज दिया।

पवन नाथ ने तरन्त ही उस ब्राण का दरवाजा छोड़ दिया और दूसरे घर से दूध आदि मांग कर सीधा गुरू गोरखनाथ जी के पास जा पहुँचा। गोरखनाथ के पास पहुँचकर उसने गाँव के दुर्जनों की सारी करतूत का ब्यौरा बयान कर दिया और कहा कि उस गरीब ब्राण को लज्जित कराने के कारण मेरे साथ भी उपहास किया। गोरखनाथ जी ने जब अपने शिष्य से उस ब्राण की गरीबी का हाल सुना तो उनकी दया का सागर उमड़ पड़ा, उन्होंने उसी समय अपनी झोली से अभिमंत्रित भस्मी को निकालकर पवन नाथ को देकर कहा, ‘‘ये भस्मी तुम गरीब ब्राण के घर में डाल आओ भगवान की इच्छा से रात ही रात में अपने गाँव के निवासियों में सबसे धनी व्यक्ति बन जायेगा, तब मैं कल स्वयं जाकर उसके घर जाकर दूध पीऊंगा।’’

गोरखनाथ की आज्ञा मानकर पवन नाथ उस भस्मी को उस निर्धन ब्राण के घर डाल आया, भस्मी ने तुरन्त ही जादू जैसा करिश्मा दिखाया। उस ब्राण का घर उसी समय दौलत एवं गायों से भर गया। इस परिवर्तन को देख गाँव के सभी नर–नारियों को भारी कौतुहल हुआ और जिन दुर्जनों ने ब्राण का उपहास किया, उनकी लज्जा के कारण गर्दन झुकी हुई थी। ब्राण व ब्राणी भी इस आश्चर्यजनक कायापलट को देखकर बुरी तरह भयभीत होकर बेहोश हो गये, उनको अपने तन मन की भी सुध नहीं रही। तन की सुध लेने वाला तब था ही कौन ? योगी राज गोरखनाथ से कोई भेद छिपा न था वह तुरन्त ही अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ ब्राण के घर जा पहुँचा और उन्होंने उन बेहोश ब्राण–ब्राणी के सिर पर कमण्डल से जल छिड़ककर उन्हें होश में किया और बोले, ‘‘तुम्हारे जो पूर्वजन्म के पाप थे अब समाप्त हो गये, अब आपके भाग्य उदय हो गये हैं, अब आप इस धन को भले कार्य में लगाकर अगला जन्म सुधारो।’’ तत्पशचात् ब्राण व ब्राणी ने साधु–सन्तों को भोजन, हलवा, पूरी स्वयं बनाकर खिलाया। तबसे ही यह परम्परा है कि किसान लोग कोई भी फसल खलिहानों से उठाने से पहले दूध, गुड़, अनाज सर्वप्रथम श्री सिद्धबली बाबा को चढ़ाते हैं।
 
कहते हैं कि इस क्षेत्र के लोगों की श्रद्धा एवं श्री सिद्धबली बाबा की कृपा से इस क्षेत्र में फसल हर वर्ष अच्छी होती है। यहाँ पर रविवार, मंगलवार एवं शनिवार को भण्डारे करने की परम्प्रा है। लेकिन रविवार को भण्डारा करने की विशेष महत्व है। कहते हैं कि श्री सिद्धबली बाबा सप्ताह में छ: दिन समाधि में रहते थे एवं केवल रविवार को अपने शिष्यों को दर्शन देते थे। इसलिये कहा जाता है कि आज भी श्री सिद्धबाबा रविवार को दर्शन देने आते हैं। श्री सिद्धबली बाबा को आटा, गुड़, घी, भेली से बना रोट एवं नारियल का प्रसाद चढ़ता है एवं हनुमान जी को सवा हाथ का लंगोट व चोला भी चढ़ता है। प्रात: ब्रमुहर्त में पुजारियों द्वारा पिण्डियों (जिनकी पूजा स्वयं सिद्धबाबा जी शिव शक्ति के रूप में करते थे) की अभिषेक पूजा की जाती है, तत्पश्चात् सर्वप्रथम साधुओं द्वारा बनाये गये रोट (गुड़, आटा व घी से बनी रोटी) का भोग चढ़ता है। तत्पश्चात् ही अन्य भोग चढ़ते हैं। दिसम्बर माह में पौष संक्रान्ति को श्री सिद्धबाबा का तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है, जिसमें लगातार तीन दिन तक बड़े भण्डारे आयोजित होते हैं एवं सवा मन का रोट प्रसाद स्वरूप बनाया जाता है।
 
 
   

                                                                           Powered By : Webline              

 

Copy rights reserved to rambhakta.com