Main page  About us Your Contribution Contact us Online Darshan Ram Naam Sangrah Bank Online Ram Bhakt Ram Bhakt Parivaar Discussion panel Online Bhent Stories and Articles Upasana Online Ramayan Online Sant
 






आनलाईन दर्शन
 
घाटा मेंहन्दीपुर बालाजी रहस्य

Bala ji maharajगीता में भगवान ने कहा है – ‘‘जब–जब धर्म की हानि होती है, तब–तब मेरी कोई शक्ति इस धरा पर अवतार लेकर भक्तों का दु:ख दूर करती है और धर्म की स्थापना करती है।’’ भक्त भय भंजन, मुनि मन रंजन अंजनी कुमार बालाजी का घाटा मेंहन्दीपुर में प्रादुर्भव इसी उद्देश्य से हुआ है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने परम प्रिय भक्त शिरोमणि पवनकुमार की सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान दिया – ‘‘हे पवनपुत्र ! कलियुग में तुम्हारी प्रधानदेव के रूप में पूजा होगी।’’ घाटा मेंहन्दीपुर में भगवान् महावीर बजरंग बली का प्रादुर्भाव वास्तव में इस युग का चमत्कार है।

राजस्थान राज्य के दो जिलों (करोली व दौसा) में विभक्त घाटा मेंहन्दीपुर दो पहाडि़यों के बीच बसा हुआ बहुत मनोरम स्थान है। यहाँ की शुद्ध जलवायु और पवित्र वातावरण मन–मस्तिष्क को महान आनन्द प्रदान करता है।

Bhairav Baba jiयहाँ मुख्य रूप से तीन देवों की प्रधानता है – श्री बालाजी महाराज, श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान (श्री भैरव बाबा)। यह तीनों देव यहाँ आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे। इनके प्रकट होने से लेकर अब तक बारह महन्त इस स्थान पर सेवा–पूजा कर चुके हैं और अब तक इस स्थान के दो महन्त इस समय भी विद्यमान हैं। सर्व श्री गणेशपुरीजी महाराज (भूतपूर्व सेवक) व श्री किशोरपुरीजी महाराज (वर्तमान सेवक)। यहाँ के उत्थान का युग श्री गणेशपुरी जी महाराज के समय से प्रारम्भ हुआ और अब दिन–प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। प्रधान मन्दिर का निर्माण इन्हीं के समय में हुआ।

Preatraj Sarkarप्रारम्भ में यहाँ घोर बीहड़ जंगल था। घनी झाडि़यों में शेर–चीते, बघेरा आदि जंगली जानवर पड़े रहते थे। चोर–डाकुओं का भी भय था। श्री महन्तजी महाराज के पूर्वज श्री गोसाँई जी को स्वप्न हुआ। स्वप्न की अवस्था में ही वे उठकर चल दिये। उन्हें पता नहीं था कि वे कहाँ जा रहे हैं और इसी दशा में उन्होंने एक बड़ी विचित्र लीला देखी। एक ओर से हजारों दीपक जलते आ रहे हैं। हाथी–घोड़ों की आवाजें आ रही हैं और एक बहुत बड़ी फौज चली आ रही है। उस फौज ने श्रीबालाजी महाराज की मूर्ति की तीन प्रदक्षिणाएँ की और फौज के प्रधान ने नीचे उतरकर श्री महाराज की मूर्ति को साष्टांग प्रणाम किया और जिस रास्ते से वे आये थे, उसी रास्ते से चले गये। गोसाँई जी महाराज चकित होकर यह सब देख रहे थे। उन्हें कुछ डर सा लगा और वे वापिस अपने गाँव चले गये किन्तु नींद नहीं आई और बार–बार उसी विषय पर विचार करते हुए, उनकी जैसे ही आँखें लगी उन्हें स्वप्न में तीन मूर्तियाँ, उनके मन्दिर और विशाल वैभव दिखाई पड़ा और उनके कानों में यह आवाज आई ‘‘उठो, मेरी सेवा का भार ग्रहण करो, मैं अपनी लीलाओं का विस्तार करूँगा’’। यह बात कौन कह रहा था, कोई दिखाई नहीं पड़ा। गोसाँई जी ने एक बार भी इस पर ध्यान नहीं दिया। अन्त में श्री हनुमानजी महाराज ने इस बार स्वयं उन्हें दर्शन दिये और पूजा का आग्रह किया।

दूसरे दिन गोसाँईजी महाराज उस मूर्ति के पास पहुँचे तो उन्होने देखा कि चारों ओर से घंटा–घडि़याल और नगाड़ों की आवाज़ आ रही है, किन्तु दिखाई कुछ नहीं दिया। इनके बाद श्री गोसाँई ने आस–पास के लोग इकट्ठे किये और सारी बातें उन्हें बताई। उन लोगों ने मिलकर श्री महाराज का एक छोटा सा स्थान बना दिया और यदा–कदा भोग प्रसाद की व्यवस्था कर दी। कई चमत्कार भी श्री महाराज ने दिखाये किन्तु यह बढ़ती हुई प्रसिद्धि कुछ विधर्मियों के शासनकाल में फिर से लुप्त हो गई। किसी शासक ने श्री महाराज की मूर्ति को खोदने का प्रयत्न किया। सैकड़ों हाथ खोद लेने पर भी जब मूर्ति के चरणों का अन्त नहीं आया तो वह हार मानकर चला गया। वास्तव में, इस मूर्ति को अलग से किसी कलाकार ने गढ़कर नहीं बनाया है, अपितु यह तो पर्वत का ही अंग है और यह समूचा पर्वत ही मानों उसका ‘कनक भूधराकार’ शरीर है। इसी मूर्ति के चरणों में एक छोटी–सी कुण्डी थी जिसका जल कभी बीतता ही नहीं था। रहस्य यह है कि महाराज की बाईं ओर छाती के नीचे से एक बारीक जलधारा निरन्तर बहती रहती है जो पर्याप्त चोला चढ़ जाने पर भी बन्द नहीं होती।

यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि मूर्ति के अतिरिक्त किसी व्यक्ति विशेष का कोई चमत्कार नहीं हैं। जो है वह है सेवा, श्रद्धा और भक्ति। स्वयं श्री महन्तजी महाराज भी इस विषय में उतने ही स्पष्ट हैं जितने अन्य भक्तगण। यहाँ सबसे बड़ा असर सेवा और भक्ति का ही है। चाहे कोई कैसा भी बीमार क्यों न हो, यदि वह सच्ची श्रद्धा लेकर आया है तो श्री महाराज उसे बहुत शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करेंगें, इसमें कोई सन्देह नहीं।

‘‘धर्मेण हन्यते व्याधि:’’

यहाँ आने वाले दर्शनार्थियों की डिप्रेशन, भूत–प्रेत की बाधा, पागलपन, मानसिक रोग, मृगी, लकवा, टी.वी. बाँझपन या अन्य किसी भी प्रकार की कोई बीमारी क्यों न हो, अतिशीघ्र दूर हो जाती है। यद्यपि हम लोग भौतिक विज्ञान के युग में रह रहे हैं और देवता या भूत–प्रेतादि में विश्वास नहीं करते हैं, किन्तु शायद श्री बालाजी के स्थान पर आकर आप अपना सारा विज्ञान भूल जायेंगे। बड़े–बड़े विज्ञानी विचारक भी यहाँ श्री महाराज के चरणों की शरण में आकर सब कुछ भूल जाते हैं और तन–मन से श्री चरणों के भक्त बन जाते हैं। जैसा कि कहा गया है –

‘नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं, मेंहन्दीपुर दरबार में’
 
[ Back ]
 
   

                                                                           Powered By : Webline              

 

Copy rights reserved to rambhakta.com