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आनलाईन दर्शन

लक्ष्मण सिद्ध
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श्रीमद् भगवत् पुराण के तेरहवें, चौदहवें अध्याय में (त्रेता युग में) सिद्धों का वर्णन है जिसमे एक लक्ष्मण सिद्ध पीठ है।

भगवान दत्तात्रेय ने लोक कल्याण के लिए अपने चौरासी शिष्य बनाये तथा उन्हें सम्पूर्ण शक्तियां प्रदान की। ये चौरासी शिष्य वर्तमान में चौरासी सिद्धों के नाम से जाने जाते हैं।

लक्ष्मण सिद्ध के बारे में यह भी कहा जाता है कि लक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के पुत्रा भगवान राम व लक्ष्मण द्वारा रावण का वध करने के पश्चात् ब्रह्म, हत्या के दोष से मुक्ति पाने को तप किया था। कहा जाता है कि भगवान राम नेसरयू तट पर तथा लक्ष्मण जी ने इसी सिद्ध के आसपास तप किया था इसलिए लक्ष्मण जी के नाम पर इस सिद्धपीठ का नाम लक्ष्मणसिद्ध पड़ा। यहाँ पर समाधि के रूप् में पूजा स्थल है।

इस सिद्धपीठ के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर सच्चे हृदय से मांगी गई हर इच्छा पूर्ण होती है। यहाँ का प्रसाद मुख्य रूप से गुड़ की भेली है। गुड़ की भेली के प्रसाद के बारे में कहा जाता है कि पुराने जमाने में मीठे के रूप में गुड़ ही हुआ करता था इसलिए कालांतर में गुड़ ही यहाँ के प्रसाद के रूप में प्रचलित हो गया।

सिद्धपीठ की व्यवस्था
लक्ष्मण सिद्धपीठ की गद्दी गुरु परम्परा पर आधारित है। गद्दी पर आसीन व्यक्ति को महन्त कहा गया है जो यहाँ की सम्पूर्ण व्यवस्था देखते हैं। इस पद के लिए व्यक्ति का चयन गद्दी नशीन करते हैं। वर्तमान में महन्त भारत भूषण भारती यहाँ के महन्त हैं जो पिछले 25 वषों से इस गद्दी पर आसीन हैं। महन्त भारत भूषण भारती को यह गद्दी महन्त बसन्त भारती द्वारा सौंपी गई। सिद्धपीठ परिसर में ब्रह्म लीन हो चुके महन्तों की सात समाधियां हैं, जहाँ श्रद्धालुजन अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।

आकर्षण
लोगों की आस्थाओं का केन्द्र होने के साथ–साथ यह स्थान प्र्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो रहा है। जिस कारण श्रद्धालुओं और सैलानियों में इसके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। लक्ष्मण सिद्धपीठ, हरिद्वार–ऋषिकेश मार्ग पर देहरादून से मात्र 11 किलोमीटर की दूरी पर बड़े ही शानत व सुरम्य वातावरण में स्थित है जबकि हर्रावाला रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी 2 किलोमीटर ही है।

विभिन्न प्रजातियों के वृक्षों से घिरे जंगल के मध्य में स्थित लक्ष्मण सिद्धपीठ परिसर में रूद्राक्ष के दो वृक्ष हैं एक तीन मुखी और दूसरा पंचमुखी, जो प्रत्येक आने वाले को अपनी ओर आकर्षित करे हैं इसके अलावा सिद्धपीठ में चारसौ मीटर की दूरी पर एक कुआं है जिसमें तीन–चार फीट पर ही पानी है। बताया जाता है कि पहले यह पानी दूध के रंग का था, परन्तु अब इसका रंग बदल गया है।

सिद्धपीठ के महन्त भारत भूषण भारती के अनुसार इस कुएं का जल स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त गुणकारी है क्योंकि इसमें जडी बूटियों का सत है इसी प्रकार सिद्धपीठ में एक अखण्ड धुना है जिसमें प्रतिदिन हवन होता है मदिर में जो भोग लगता है वह इसी धुने में बनता है। वैसे तो यहाँ कभी भी आया जा सकता है, किन्तु रविवार के दिन यहाँ आने का महत्व बढ़ जाता है। रविवार के दिन यहाँ मेला सा रहता है और श्रद्धालु अपनी आस्था व्यक्त करने के साथ–साथ यहाँ के सुरम्य एवं मनोरम वातावरण का खूब आनन्द उठाते हैं।

भण्डारा
मन्दिर में हर वर्ष अप्रैल माह के अन्तिम रविवार को विशाल वार्षिक भण्डारे का आयोजन मन्दिर समिति की ओर से किया जाता है, तथा इसके अलावा हर रविवार को कोई न कोई भक्तजन इस मन्दिर में भण्डारे का आयोजन करते रहते हैं।

प्राचीनता
लक्ष्मण सिद्ध पीठ में रूद्राक्ष के पेड़ भी मौजूद हैं जिनमें एक पेड़ कम से कम 200 वर्ष पुराना है। इसमें एकमुखी से लेकर सोलहमुखी तक के रूद्राक्ष मिल सकते हैं।

समाधि स्थल
लक्ष्मण सिद्धपीठ में अभी तक सात महन्त ब्रह्म लीन हो चुके हैं इस समय आठवें महन्त श्री भारत भूषण भारती गद्दी पर आसीन हैं। उपरोक्त सातों महन्तों की समाधि मन्दिर परिसर में ही बनी है जिनके कुछ नाम इस प्रकार हैं – ब्रानन्द भारती, विभूति भारती, शंकर भारती, कृष्णा भारती, बसन्त भारती आदि।

विशेष आकर्षण
लक्ष्मण सिद्धपीठ के कुछ ही दूरी पर एक कुआं है जिसमें पानी भरा रहता है। बताया जाता है कि कुएं में पानी के साथ एक सुनहरे रंग का सांप भी रहता है, लेकिन वह कभी–कभी दिखाई देता हे। यह सांप हरकिसी को दिखाई नहीं देता है। यह किसी–किसी को ही दिखाई देता है। इस कुएं की ऐसी मान्यता है। इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के पुत्र भगवान राम व लक्ष्मण द्वारा रावण का वध करने के पश्चात् ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति हेतु भगवान राम ने सरयू तट पर तथा लक्ष्मण ने इसी स्थान पर तप किया था इसी लिये इसका नाम लक्ष्मण सिद्ध पड़ा। कहा जाता है कि इसी समय लक्ष्मण जी ने तीर से पानी निकाला था जो कि आज भी कुएं के रूप में मौजूद है। जबकि आज इसमें से मन्दिर की जलापूर्ति की जाती है।
 
 
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