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Khatu Shyam Mandir

श्री श्याम परिचय

अखण्ड जोत है अपार माया - श्यामदेव की परबल छाया

खाटू श्यामजी का नाम, आज से कुछ वर्षों पूर्व केवल राजस्थान के परिवारों में ही जाना जाता था, मगर काफी कुछ वर्षों से खाटू श्याम जी का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है कि आज केवल भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व के भारतीय परिवारों में न केवल जाना जाता है बल्कि अधिकाधिक परिवार खाटू श्यामजी के चमत्कारों को अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से देख चुके हैं ।

आज पूरे भारत के सभी शहरों एवं गांवों में खाटू श्याम जी से सम्बन्धित संस्थानों द्वारा भजन-कीर्तन एवं कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं और अपने नाम के अनुरूप ये कलयुग के अवतारी खाटू श्यामजी अपने समस्त भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। जो भी व्यक्ति राजस्थान के सीकर जिले में रींगस से १७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित खाटू श्याम जी में जाता है उसके जीवन के समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं और प्रभु के दर्शन मात्र से उसके जीवन में खुशियां एवं सुख शान्ति का भण्डार भरना प्रारम्भ हो जाता है। यह पावन धाम भारत की राजधानी दिल्ली से लगभग ३०० किलोमीटर व राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग ८० किलोमीटर की दूरी पर स्थित खाटू श्याम जी की पौराणिक प्रचलित पावन कथा संक्षिप्त में इस प्रकार है ।

महाभारत काल में पाण्डवरत्न महाबली भीम व भीम के पुत्र घटोत्कच से सभी लोग परिचित हैं। वीर घटोत्कच के शास्त्रार्थ की प्रतियोगिता जीतने पर, इनका विवाह मणीपुर दैत्य की राजा मुर की पुत्री मौरवी से हुआ। मौरवी को कामकंटका व अहिल्यावती के नामों से भी जाना जाता है। वीर घटोत्कच व मौरवी को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसके बाल बब्बर शेर की तरह होने के कारण इनका नाम बर्बरीक रखा गया ये वीर बर्बरीक हैं जिन्हें हम खाटू के श्याम, कलयुग के अवतार, श्याम सरकार, तीन बाणधारी, शीश के दानी, खाटू नरेश व अन्य अनगिनत नामों से जानते व मानते हैं ।

बालक वीर बर्बरीक के जन्म के पश्चात घटोत्कच इन्हें भगवान श्री कृ्ष्ण के पास लेकर गए और भगवान श्री कृ्ष्ण ने वीर बर्बरीक के पूछने पर, जीवन का सर्वोत्तम उपयोग, परोपकार, व निर्बल साथी बनना बताया। वीर बर्बरीक ने वापस आकर समस्त अस्त्र-शस्त्र और विद्या ज्ञान हासिल कर विजय नामक ब्राहमण का शि्ष्य बनकर उनके यज्ञ को राक्षसों से बचाकर, उनका यज्ञ सम्पूर्ण करवाने पर माँ भगवती शिव शंकर बर्बरीक से अति प्रसन्न हुए व उनके सम्मुख प्रकट होकर तीन बाण प्रदान किए जिससे तीनों लोक में विजय प्राप्त की जा सकती थी ।

महाभारत का युद्ध होने पर वीर बर्बरीक ने अपनी माता के सम्मुख युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की और तब इनकी माता ने इन्हें युद्ध में भाग लेने की आज्ञा इस वचन के साथ दी कि तुम युद्ध में हारने वाले पक्ष का साथ निभाओगे। जब बर्बरीक युद्ध में भाग लेने चले तब भगवान श्रीकृ्ष्ण ने राह में इनके भेंट की और इनके बल की परीक्षा लेने के पश्चात् इनसे इनका शीश  दान में मांग लिया क्योंकि अगर बर्बरीक युद्ध में भाग लेते तो कौरवों की समाप्ति केवल १८ दिनों में महाभारत के युद्ध में नहीं हो सकती थी व युद्ध निरन्तर चलता रहता ।

वीर बर्बरीक ने भगवान श्रीकृ्ष्ण के कहने पर जन-कल्याण, परोपकार व धर्म की रक्षा के लिए अपने शीश  का दान उनको सहर्ष दे दिया व कलयुग में भगवान श्रीकृ्ष्ण के अतिप्रिय नाम श्री श्याम नाम से पूजित होने के वरदान प्राप्त किया। बर्बरीक की युद्ध देखने की इच्छा भगवान श्रीकृ्ष्ण ने बर्बरीक के शीश  को ऊँचे पर्वत पर रखकर पूर्ण की। युद्ध समाप्ति पर सभी पण्डवों के पूछने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि वह युद्ध केवल भगवान श्रीकृ्ष्ण की नीति के कारण जीता गया और इस युद्ध में केवल भगवान श्रीकृ्ष्ण का सुदर्शन चक्र था व द्रोपदी चण्डी का रूप धरकर दु्ष्टों का लहु पी रही थीं। भगवान श्रीकृ्ष्ण ने बर्बरीक के शीश को अमृत से सींचा व कलयुग का अवतारी बनने का आशीर्वाद प्रदान किया ।

आज यह सच हम अपनी आंखों से देख रहे हैं कि उस युग के बर्बरीक आज के युग के श्याम हैं और कलयुग के समस्त प्राणी श्यामजी के दर्शन मात्र से सुखी हो जाते हैं। उनके जीवन में खुशियों और सम्पदाओं की बहार आने लगती है और खाटू श्यामजी को निरन्तर भजने से प्राणी सब प्रकार के सुख पाता है और अंत में मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ।

खाटू नरेश जी जय



Shri khatu shyam ji

Shyam kunda

 
 
 
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