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खाटूश्याम धाम

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है–

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।

जब–जब पृथ्वी पर धर्म की हानि और पाप का प्रसार होने लगता है, तब तब मैं दुष्टों का नाश करने, साधु पुरूषों का उद्धार करने व धर्म की स्थापना हेतु युग–युग में अवतरित होता हूं ।

इस तरह भगवान के अनेक अवतार हो चुके हैं। कभी किसी रूप में, कभी किसी नाम से। द्वापर युग में प्रभु श्रीहरि विष्णु श्री कृष्णावतार के रूप में प्रकट हुये और उन्होंने राष्ट्र, समाज व मानवोत्थान के अनेकानेक दुष्कर कार्य सम्पन्न किये।

भगवान के अनेक भक्त हैं, परन्तु सच्चा भक्त कोई बिरला ही होता है, भक्तों की कोटि में वीर शिरोमणि बर्बरीक भी हैं। महाभारत युद्ध में बर्बरीक ने उपस्थित होकर अपना एक बाण का चमत्कार दिखा सभी वीरों को आश्चर्य में डाल दिया था। वीर बर्बरीक ने रणभूमि में अपना शीश श्रीकृष्ण भगवान को दान देकर वीरता का अनूठा कार्य किया, जिसके फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण ने कलियुग में मेरे नाम से पूजनीय होने व भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने का आशीर्वाद दिया। आज श्याम खाटू दरबार से भक्तजन आकर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण कर रहे हैं।

पुराणों व ग्रन्थों में श्याम प्रभु के अलग–अलग नामों का वर्णन है, श्री श्यामजी को सहृदय, सिद्धसेन, सिद्धैश्चर्य, सूर्यवर्चा, चाण्डिल, भीम पौत्र आदि बताया गया है जो उनके द्वारा की गयी तपस्या, सिद्धि व जीवन से जुड़े हैं। तीन बाणधारी, शीश के दानी, नीले के अवसार आदि नाम भी उनकी दानवीरता पर आधारित हैं।महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के मूल ग्रंथ ‘‘जय काव्य’’ में, महाभारत के समय ‘‘बर्बरीक बलिदान’’ का स्पष्ट उजागर न होने से इस काव्य में स्थान पाने से वंचित रह गया था। जिसकी पूर्ति वेद व्यास जी ने स्कन्द महापुराण के कोमारिक खण्ड के ‘‘बर्बरीक उपाख्यानम्’’ की है।पूजनीय श्रीश्याम सरकार की जीवनी (इतिहास) का भक्तजनों व कवियों ने भिन्न–भिन्न रूप में वर्णन किया है। समस्त इतिहास का मूल सारांश यह है कि बर्बरीक महा बलवान यौद्धा थे। उन्हाने पाण्डव कुल में जन्म लेकर अनेकानेक सिद्धियां प्राप्त कर महाभारत के युद्ध में अपनी वीरता का प्रदर्शन कर भगवान श्रीकृष्ण को शीश दान में दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना स्वरूप प्रदान कर कलियुग पूजित होने को कहा जो कलियुग में आज जन–जन के आराध्य हैं।

श्याम प्रभु के सम्पूर्ण भारतवर्ष में जगह–जगह मन्दिर भी हैं। खाटू धाम में विशेषत: फागुन शुक्ल पक्ष में अपनी–अपनी मनोकामना लें भक्तजन नंगे पांव व निशान लेकर तथा रेलों बसों व स्वयं के साधनों से बड़ी दूर–दूर से आते हैं। यहां पधारें लाखों भक्तजन धाम की सिद्धि को पुकार–पुकार कर कह रहे हैं।

श्री श्याम बाबा का मन्दिर भारत के प्रसिद्ध गुलाबी नगर जयपुर से उत्तर में वाया रींगस होके 80 किलोमीटर और सीकर से 60 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है।

पश्चिम रेलवे का रींगस जंक्शन श्याम बाबा के आने जाने वाले यात्रियों का मुख्य रूप से रास्ते में पड़ता है क्योंकि दिल्ली–अहमदाबाद–जयपुर, सीकर आदि से आने वाले यात्रियों को रेलों बसों से पहले रींगस जंक्शन ही उतरना पड़ता है। उसके बाद पैदल या ऊंटों के लड्ढों जीपों या बसों द्वारा खाटू 17 किलोमीटर जाया जाता है।

खाटू नगरी की पौराणिक पृष्ठभूमि -

खाटू की स्थापना राजा खट्टवांग ने की उसका (गांव का) नाम खट्टवांग ही था। राजा खट्टवांग ने बभ्रुवाहन के देवरे में सिर की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करवाई। इतिहासविद् और पत्रकारिता के भीष्मपितामह पंडित झावरमन शर्मा इस अवधारणा के समर्थक थे। परन्तु पौराणिक कथाओं में जिस खट्टगांव का उल्लेख मिलता है, वह महाभारत के पहले का था। जयपुर के राजगुरू विद्यानाथ झा ओझा मानते हैं कि तत्कालिन जीवन शैली में महाभारत से पहले के खट्टगांव का उल्लेख भी हो सकता है। यदि प्राचीन भारत के सभ्यता संस्कृति के इतिहासकार डी.डी. कौशांबी की माने तो वह ईसा पूर्व की घटना रही होगी। यद्यपि मत्स्य देश मरूकांतर में महाभारत कालीन विराटनगर का अस्तित्व मिला है। विराटनगर और खंडेला के उत्खनन में ईसा पूर्व दूसरी तीसरी शताब्दी के प्राचीन शिलालेख भाबू्र लिपि में मिले हैं। जिससे सम्राट अशोक ने बौद्ध ग्रंथों में उल्लेखित सात स्थलों को चिन्हित किया है। विराटनगर में बौद्ध कालीन स्तूप के अवशेष मिले हैं। साकाम्बर (सांभर) में बौद्ध काली औद्योगिक नगरी के भग्रावशेष भी मिले हैं। दसवीं सदी तक खाटू क्षेत्र के इतिहास के पन्ने सफेद हैं। दसवीं सदी में खाटू के नजदीक सीकर से 12 किलोमीटर पर हर्ष का पहाड़ रंगमंच पर आता है। वहां हर्षदेव शिव का दसवीं सदी का मन्दिर खडंहर में बदल गया है। दसवीं, ग्यारवीं सदी में इसे सम्पादलक्ष अन्नतदेश के नाम से जाना जाता था।

पद्रहवीं सदी में आमेर के तेरहवें राजा के पोते शेख्जूर द्वारा शेखावाटी बसाने और अमरसर को राजधानी बनाकर 360 गांव पर राज करने का ब्यौरा मिलता है। उनके राज में बर्बरीक श्याम देवरे के पुरानी राजपूत थे। सत्रहवीं सदी में बभ्रुवाहन देवरे को लेकर खंडेलाके राजा बहादुर सिंह और बादशाह आरंगजेब की सेनाओं के बीच घमासान जंग हुआ। कर्नल टाड ने भी इसका उल्लेख किया है। रियासती दस्तावेजों के अनुसार खंडेला के राजा बहादुर सिंह के पिता राजा वर सिंह औरंगजेब ने मन्दिर देवरों की प्रतिमाओं को तोड़ने का फरमान जारी किया। बहादुर सिंह ने इसे नहीं माना और उन्हें दबाने दराव खां को भेजा गया। खंडेल राजा ने क्षत्रिय वीरों को बुला लिया। उनमें नव विवाहित राव सुजान सिंह भी थे। राव सुजान सिंह उसी समय नववधू लेकर लौटे थे। उनकी कर्तव्य परायणना को देख का राजकवि ने कहा–

झिरमिर–झिरमिर मेवा बरसे, मोरा छतरी छाई जी।
कलमें हो तो आव सुजाण, फौज देवरे आई जी।।

राजा बहादुर सिंह की सेना और औरंगजेब की सेना में घमासान युद्ध हुआ। सेनापति दराव खां ने संदेश भेजा कि कलश उतारने दे तो संधि हो सकती है। बहादुर सिंह ने संधि की शर्तें को तो हीन माना, उन्होंने कहलवाया कि उनके रहते कलश तो क्या मिट्टी का ढेला भी नहीं देंगे। औरंगजेब नामा में इस घटना का ब्यौरा लिखा है। दराव खां की सेना खण्डेला को रौंदते चली गयी और बभ्रंमान का देवरा ध्वस्त हो गया। 8 मार्च 1679 को दराव खां ने खाटू में प्रवेश किया। औरंगजेब के समकालीन आमेर जयपुर के राजा रामसिंह रत्न रूपकवि दुर्गादास कायथ ने श्याम पचीसी ऐतिहासिक अध्यात्मिक काव्य की रचना की। 315 वर्ष पुरानी हस्तलिखित श्याम पचीसी में 15 सोपान, 114 दोहे, 24 सवैये और पांच छप्पैये हैं। इसकी मूल प्रति जयपुर रियासत के पौथीखाने में सुरक्षित है। यद्यपि काव्य बज्र भाषा में है। परन्तु उसमें ढुंढारी, फारसी शब्दों का भी प्रयोग किया है। उन्होंने औरंगजेब की देवरे नीति पर चोट करते हुए लिखा है।

1675 में श्यामजी ने देवताओं के साथ निजधाम की यात्रा को प्रयाण किया। तब उरंग औरंगजेब द्वारा फतवा फेरने के कारण कहा कि जो खाटूधाम की यात्रा करेंगे उन्हें वे अपने लोक में स्वीकार करेंगे। 1707 में बादशाह की मृत्यु के बाद बभ्रुवाहन स्थल की पुर्नसंरचना का दौर आरम्भ हुआ । शिला लेखों के अनुसार ’फाल्गुन सुदी सप्तमी सन् 172 में अजमेर के महाराधिराज राजराजेश्वर अजित सिंह जी सिसोदिया के कुंवर साहेब अभय सिंह जोधपुर ने वर्तमान बर्बरीक देवरे की आधारशिला रखकर पुन: सदियों पुरानी बभ्रुवाहन के शीश की प्रतिमा लाकर प्राण प्रतिष्ठा की गयी अर्थात् वर्तमान देवालय मात्र. 283 वर्ष पुरानी है। अठारहवीं संदी में बभु्रवाहन दम तोड़ती मुगलिया सल्तनत की नजरों में खटकनें लगा। पंडित झाबरमल शर्मा, श्याम सुंदर शर्मा और गोपाल नारायण बटुरा लिखते हैं कि सन् 1779 में दिल्ली दरबार के मुगल के सरदार मुर्तजा खां मडेच ने तोरावाटी के रास्ते से जुर्माना मामला की रकम के लिए शेखावाटी पर हमला किया। हर्ष के रावराजा देवी सिंह ने उन्हें जवाब भेजा ​कि वे जयपुर रियासत में आते हैं। अत: दोहरी रकम कैसे दें? उधर भडेच की सेनाएं रींगस होती हुए आगे बढ़ी।

भड़ेच ने खाटू के पास शिविर लगाया। देवीसिंह के सामने बर्बरीक श्याम स्थल, साधुओं हर्ष के पहाड़ को बचाने की चुनौती आई। ऐसे में नागा साधु मंगलदास ने अपने शिष्यों के साथ जयपुर की सेना से मिलकर भड़ेच से शमशीरें आजमाई। इस ऐतिहासिक युद्ध में नागा साधुओं मंगलदास और उनके एक हजार शिष्य खेत रहे। लेकिन मुर्तजा खां भड़ेच और उनकी सेना का नामोनिशान नहीं रहा। नागा साधुओं के शौर्य पर राजस्थान में (दिग्विजय नाथ हाय) कहावत का प्रचलन हुआ। खाटू में नागा साधुओं की बगल में बनी समाधियां इसकी जीवंत गवाह है। जयपुर रियासत के राजा प्रतापसिंह ने खाटू में नामा साधु मंगलदास के शिष्य संतोष का ठिकाना कायम किया। यो बभ्रुवाहन हमलावरों से बचाना रहा। यहां के पुजारी सदियों से चौहान राजपूत है। समझा जाता है कि दसवीं ग्यारहवीं सदी में राजा हर्ष के समय वह व्यवस्था लागू हुई। जिसे अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने पुख्ता किया। राजपूत पुजारियों के अलावा ब्राहमण पुजारी भी हैं, वर्तमान में राजपूत सेवक है तथा पूजा कार्य ब्राहमण करते है। फाल्गुन में निशान लेकर लोग अपने–अपने गांवों से टोली बनाकर निकलते थे, जिसमें सूरजगढ़ के सांवरलराम माली का निशान 12 बारस को मन्दिर की शिखर पर चढ़ता था जो बारहों महीना शिखर बंद पर रहता था।

 
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