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आनलाईन दर्शन
 
Dushkeshwar Mandir
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श्री गणनायक चन्द्रधन हरनन्दन हेरम्ब
विनयौं केशव विनहर नौमि तनय जगदम्ब
गौरी गणेश महेश अरू सहित रमेश दिनेश
विनवतहौं सब देववर गुरू शारदा शेष

सर्वेश्वर भगवान शिव जी की जगत कल्याणकारी अनेक लीलाओं का वर्णन शिव पुराणान्तर्गत श्री व्यास जी ने किया है। जिसका पठन-पाठन श्रवण कर सांसारिक प्राणी तो क्या देवताओं ने भी मनोंवांछित फल की प्राप्ति की है।

 

यहाँ हम श्री सती देवी के मूर्ति रूप में प्रकट होने का वर्णन सांसारिक प्राणियों के कल्याणार्थ संक्षेप में करते हैं। सर्वशक्ति ने किस प्रकार मूर्त रूप धारण किया, और ब्रह्मा तथा दक्ष किस प्रकार तपश्चर्या के द्वारा आदिशक्ति की आराधना कर अपने उद्देश्य में सफल हुए। जगत की मर्यादा हेतु दक्ष प्रजापति ने अपनी नगरी कनखल में महान यज्ञ का अनुष्ठान किया। शिव माया से मोहित होकर यज्ञ में भगवान शिव जी को तथा जगदम्बा सती जी को निमंत्रित नहीं किया। सती के स्वंय यज्ञ स्थल पर आने पर भी दक्ष प्रजाति ने उनका अनादर किया। प्रेमपूर्वक सती को यज्ञ भाग समर्पित न कर उन्हें कटु वचन कहे। सती देवी ने यज्ञ में आये अनेक देवताओं तथा ऋषि-मुनियों और ब्राहमणों के समक्ष अपने पति भगवान  शंकर की निन्दा सुनकर, शास्त्र की इस मर्यादा के पालन हेतु "कोई भी स्त्री पति निन्दा सुनकर जीवित नहीं रह सकती''  योगाग्नि से अपना शरीर भस्म कर दिया। इसकी सूचना पाकर भगवान शंकर अत्यंत क्रोधित हुए और अपनी जटा की फटकार से वीरभद्र एवं महाकाली नाम की महाशक्तियों की सृिष्ट कर, वीरभद्र के नेतृत्व में गणों को भेजकर दक्ष प्रजापति के यज्ञ को, विष्णु आदि देवों के विरोधी दक्ष पक्ष की ओर से युद्ध करने पर भी नष्ट कर दिया और दक्ष का सिर उसके शरीर से अलग कर अग्नि कुण्ड में डाल दिया। तत्पश्चात वीरभद्र ने जाकर भगवान शंकर को सभी वृतांत सुनाया। तदुपरान्त विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, बृहस्पति आदि समस्त देवताओं द्वारा स्तुति करने पर श्री आशुतोष भगवान शिव जी प्रसन्न होकर दक्ष के यज्ञ स्थल पर गये। दक्ष के कवध पर बकरे का सिर जोड़कर जीवित करने के पश्चात वैदिक मार्ग को प्रशस्त करने के लिए, दक्ष यज्ञ में भाग लेकर यज्ञ को पूर्ण किया।

पौराणिक काल के ख्याति प्राप्त कनखल में यह स्थल जिस भूमि पर विद्यमान है, वहां पर भी श्री दक्षेश्वर नाम से लोक प्रतिष्ठा हेतु ओंकार स्वरूप शिव स्थित हैं। यज्ञ कुण्ड, सती शरीर त्याग स्थल तथा ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं का भी स्थल है। इसी प्रांगण में एक वृहत्काय श्री हनुमान जी की मूत्रि जिसके वाम व दक्षिण पार्श्व में श्री भैरव तथा श्रीगणेश जी की चित्ताकर्षक मूर्तियां हैं। इनके दर्शन मात्र से शान्ति मिलती है। इन सभी मन्दिरों का प्रबन्ध  "श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी'' धार्मिक संस्था द्वारा होता है। इस मन्दिर को देखकर भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी एवं आन्ध्र, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल महोदयों ने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

 

   
 
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