Main page  About us Your Contribution Contact us Online Darshan Ram Naam Sangrah Bank Online Ram Bhakt Ram Bhakt Parivaar Discussion panel Online Bhent Stories and Articles Upasana Online Ramayan Online Sant
 







श्री हनुमान  चालीसा


[ Click here to Download ]

श्रीहनुमान चालीसा

संत प्रवर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह हनुमान चालीसा हिन्दी भाषी जगत् में सर्व प्रसिद्ध है। जिस प्रकार से श्रीरामचरित मानस का प्रचार प्रसार है उससे भी कहीं अधिक हनुमान चालीसा का है। प्रत्येक कल्याणकामी व्यक्ति के लिये बल, बुद्धि, विद्या इन तीनों की प्राप्ति परमावश्यक है। बल–बुद्धि–विद्या से रहित कोई भी व्यक्ति, जाति तथा राष्ट्र किसी भी प्रकार से सुख–समृद्धि का भाजन नहीं बन सकता और बल–बुद्धि–विद्या के स्रोत रुद्रावतार भगवान् आंजनेय हैं, उनकी प्राप्ति के लिये उनके चरित्र चिन्तन के रूप में विरचित हनुमान चालीसा एक अमोघ साधन है। हनुमान चालीसा की साधना बड़ी सरल और सुगम है, थोड़े ही प्रयास से अल्पज्ञ बालक भी इसे याद कर सकता है। बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष कोई भी श्रद्धायुक्त हो प्रात:काल शौच–स्नान के पश्चात् श्रीहनुमान जी की मूर्ति के समक्ष मन्दिर में व घर में ही श्री हनुमान जी के चित्र के सामने, हो सके तो अगरबत्ती जलाकर श्रीहनुमान जी का ध्यान करते हुए इस चालीसा का नित्यप्रति पाठ करें, इससे वह सब प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर सुख–समृद्धि का पात्र बनेगा इसमें सन्देह नहीं। किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए ब्रचर्य का पालन करते हुए एक बार आहार व फलाहारी रहकर चालीस दिन तक 108 पाठ नित्य करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

।। दोहा।।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन–कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

।। चौपाई।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मुँज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे।।

लाय संजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हरी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा।। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दु:ख बिसरावै।।
अन्त काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि–भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत् सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जय जय जय हनुमान गौसाईं। वृपा करहु गुरुदेव की नाईं।
जो त बार पाठ कर कोई। छुटहि बंदि महासुख होई।

जो यह पढ़ै हनुमान् चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

।।। दोहा।।
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

[ Back ]


   

                                                                           Powered By : Webline             

 

Copy rights reserved to rambhakta.com